Auricularia auricula-judae का नाम एक पुरानी किंवदंती से निकला है, जिसके अनुसार जुडास इस्करियोती ने बड़बेरी यानी एल्डर के वृक्ष पर फांसी लगाई थी, और यही कवक उस वृक्ष की शाखाओं पर पाया जाता है। इसी वजह से इसे पुराने समय में "ज्यूज़ ईयर" भी कहा जाता था, जबकि आज इसे साधारणतः "वुड ईयर" या "जेली ईयर" के नाम से जाना जाता है।
यह Auriculariaceae परिवार और Auriculariales गण से संबंधित एक कवक प्रजाति है, जिसका फलनकाय भूरे रंग का, जेली जैसा और स्पष्ट रूप से मानव कान की आकृति वाला होता है। यह मुख्यतः लकड़ी पर, विशेष रूप से एल्डर वृक्ष पर उगता है, और यूरोप में वर्षभर देखा जा सकता है। इसकी विचित्र आकृति, प्राचीन लोक-कथा से जुड़ा नाम और सदियों पुराना औषधीय इस्तेमाल इसे कवक जगत में एक दिलचस्प उदाहरण बनाते हैं।
फलन काय और पहचान
इस कवक की सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता इसकी फूली-लटकी हुई, कान जैसी आकृति है, जो कभी-कभी प्याले के आकार की भी हो सकती है। फलनकाय आमतौर पर 9 सेंटीमीटर तक चौड़ा और मात्र 3 मिलीमीटर तक मोटा होता है, और यह लकड़ी से पार्श्व रूप से या किसी बहुत छोटे डंठल के सहारे जुड़ा रहता है। ताज़ी अवस्था में यह मोटा, जेली जैसा और लचीला होता है, लेकिन सूखने पर कठोर और भंगुर बन जाता है।
ऊपरी सतह लाल-भूरे रंग की होती है जिसमें थोड़ी बैंगनी आभा होती है, और यह बारीक रोमों से ढकी होती है जो इसे मखमली बनावट देते हैं। युवा नमूनों में यह सतह सामान्यतः चिकनी होती है, जबकि उम्र बढ़ने के साथ यह लहरदार और सिकुड़नदार हो जाती है और रंग गहरा होता जाता है। निचली सतह हल्के भूरे-धूसर रंग की, चिकनी और कभी-कभी सिलवटों या "शिराओं" वाली होती है, जो इसकी कान जैसी छवि को और बढ़ा देती है।
सूक्ष्म स्तर पर, बीजाणु सॉसेज के आकार के (allantoid), 15–22 x 5–7 माइक्रोमीटर आकार के होते हैं, और बेसिडिया बेलनाकार, 65–85 माइक्रोमीटर लंबे तथा भीतर से तीन अनुप्रस्थ दीवारों वाले होते हैं। कभी-कभी पूरी तरह रंगहीन, सफेद फलनकाय भी मिल जाते हैं, जिन्हें पहले पृथक प्रजाति Auricularia lactea का नाम दिया गया था, पर असल में ये केवल रंगहीन रूप हैं जो अक्सर सामान्य रंगीन नमूनों के साथ ही उगते हैं।
यूरोप में इससे मिलती-जुलती एकमात्र प्रजाति Auricularia cerrina है, जो ओक की लकड़ी पर उगती है और गहरे धूसर से काले फलनकाय के कारण अलग पहचानी जाती है। एशिया की Auricularia heimuer और उत्तर अमेरिका की Auricularia angiospermarum भी बहुत समान दिखती हैं, लेकिन सूक्ष्मदर्शी से देखने पर इनके बेसिडिया और बीजाणु छोटे पाए जाते हैं।
वितरण और आवास
यह कवक मुख्यतः चौड़ी-पत्ती वाले वृक्षों और झाड़ियों की लकड़ी पर उगता है, विशेष रूप से बड़बेरी यानी एल्डर पर। इसके अलावा यह सिकामोर मेपल, बीच, ऐश और स्पिंडल वृक्ष पर भी सामान्यतः पाया जाता है, जबकि कोणधारी (कोनिफर) वृक्षों पर इसका उगना बहुत दुर्लभ है। यह पुरानी, मृत शाखाओं को पसंद करता है, जहाँ यह अपघटक (सैप्रोट्रॉफ) के रूप में मृत लकड़ी पर या कमजोर परजीवी के रूप में जीवित लकड़ी पर पलता है और लकड़ी में "श्वेत क्षय" (white rot) उत्पन्न करता है।
यह प्रायः एकल रूप से उगता है, लेकिन समूह में या गुच्छों में भी पाया जा सकता है। इसकी निचली सतह से प्रति घंटे कई लाख बीजाणु हवा में छोड़े जाते हैं, और यह दर तब भी ऊँची बनी रहती है जब फलनकाय काफी हद तक सूख चुका होता है।
यह प्रजाति यूरोप में व्यापक रूप से फैली हुई है, लेकिन अन्यत्र इसके पाए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। पहले इसे विश्वव्यापी और विविधतापूर्ण प्रजाति माना जाता था, परंतु आनुवंशिक अनुक्रमों के विश्लेषण से पता चला है कि पूर्वी एशिया में उगाई जाने वाली "A. auricula-judae" असल में Auricularia heimuer है, जबकि उत्तर अमेरिका की चौड़ी-पत्ती वृक्षों पर मिलने वाली प्रजाति Auricularia angiospermarum है।
GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़ों में जनवरी, अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में सबसे अधिक दर्शन दर्ज हुए हैं, जबकि जून से अगस्त के बीच यह संख्या काफी घट जाती है। ये आँकड़े केवल कवक की उपस्थिति के अवलोकन दर्शाते हैं, न कि इसकी वास्तविक बहुतायत या पूर्ण भौगोलिक फैलाव का प्रमाण हैं, फिर भी यह संकेत मिलता है कि शरद-शीत ऋतु में इसकी उपस्थिति अधिक दर्ज की जाती है।

उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास
इस कवक का स्वाद हल्का और अक्सर नीरस माना गया है, और इसकी बनावट की तुलना "हड्डियों वाले रबर को खाने" से की गई है। उन्नीसवीं सदी के ब्रिटेन में इसे खाद्य कवक के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, जबकि पोलैंड में इसे सामान्यतः खाया जाता रहा है। पूर्वी एशियाई खान-पान में जिस "वुड ईयर" कवक का व्यापक उपयोग होता है, वह वास्तव में एक निकट संबंधी प्रजाति Auricularia heimuer है, जिसे लंबे समय तक इस प्रजाति के साथ भ्रमित किया जाता रहा। इसे सुखाकर और फिर पानी में भिगोकर उपयोग किया जा सकता है, जिससे यह अपने आकार का तीन से चार गुना तक फूल जाता है, परंतु इसे कच्चा खाना उपयुक्त नहीं माना गया और पकाना आवश्यक बताया गया है। सूखे कवक के 100 ग्राम में लगभग 370 किलोकैलोरी ऊर्जा, 10.6 ग्राम प्रोटीन और 65 ग्राम कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है।
इस कवक का उपयोग सदियों से लोक-चिकित्सा में भी होता रहा है। इसे आँखों की सूजन पर पुल्टिस के रूप में और गले की समस्याओं में उपशामक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। सोलहवीं सदी के वनस्पति विशेषज्ञ जॉन गेरार्ड ने 1597 में इसे दूध में उबालकर या बीयर में भिगोकर गले की खराश के इलाज के लिए सुझाया था, और इसी तरह की सलाह कैरोलस क्लूसियस (1601) और जॉन पार्किंसन (1640) ने भी दी। सत्रहवीं सदी के अंत में जॉन पेची ने भी इसे दूध में उबालकर या सिरके में भिगोकर गले और मुँह की सूजन के लिए गरारा करने की सलाह दी थी। इस औषधीय उपयोग की परंपरा कम से कम 1860 तक जीवित रही, जब यह अब भी कोवेंट गार्डन में बिकता था, हालाँकि उस समय तक इसे इंग्लैंड में खाद्य नहीं समझा जाता था।
इस कवक का उल्लेख साहित्य में भी मिलता है। क्रिस्टोफर मार्लो के नाटक "द ज्यू ऑफ माल्टा" में इसका संदर्भ है, जहाँ एक पात्र कहता है कि जुडास ने जिस टोपी को एल्डर के नीचे छोड़ा था, वही टोपी उसकी फांसी से जुड़ी थी। माना जाता है कि यह कवक एमिली डिकिंसन की कविता "द मशरूम इज़ द एल्फ ऑफ प्लांट्स" की प्रेरणा का भी एक अंश रहा हो, जिसमें मशरूम को "अंतिम विश्वासघाती" के रूप में दर्शाया गया है।
रोचक तथ्य
- चीन में इस कवक-समूह की खेती के प्रमाण सातवीं शताब्दी ईस्वी जितने पुराने मिलते हैं, जिससे यह इतिहास में जानबूझकर उगाए गए सबसे पुराने कवकों में से एक माना जाता है।
- सूखने पर फलनकाय अपने वज़न का लगभग 90% खो देते हैं, फिर भी वे इस अवस्था में भी थोड़ी मात्रा में बीजाणु छोड़ना जारी रखते हैं।
- एक ही फलनकाय की निचली सतह से प्रति घंटे कई लाख बीजाणु हवा में मुक्त होते हैं।
- यह कवक कोणधारी वृक्षों पर बहुत ही कम पाया जाता है, जबकि इसके निकट संबंधी उत्तर अमेरिकी रूप विशेष रूप से कोनिफर की लकड़ी पर ही उगते हैं।
पारिस्थितिकी
आवास
- वन
- वनभूमि



