जंगलों में जब कोई पक्षी दूसरी कई प्रजातियों की आवाज़ों को लगभग पूर्णता से दोहराता सुनाई दे, तो वह अक्सर Dicrurus paradiseus ही होता है। यह मध्यम आकार का एशियाई पक्षी अपनी लंबी, दोहरी पूंछ के लिए पहचाना जाता है जिसके सिरों पर छल्लेनुमा चौड़ाई होती है। यह ड्रोंगो परिवार Dicruridae का सदस्य है और इसे IUCN द्वारा 'सबसे कम चिंताजनक' श्रेणी में रखा गया है।
यह पक्षी दिन में सक्रिय रहता है, लेकिन भोर से काफी पहले और शाम ढलने के बाद भी सक्रिय देखा जाता है। इसके व्यापक वितरण और क्षेत्रीय विविधता के कारण यह भौगोलिक पृथक्करण और आनुवंशिक विचरण से हुई प्रजातिकरण का एक जाना-पहचाना उदाहरण बन गया है।
पहचान और रूप
इसकी सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता इसकी लंबी बाहरी पूंछ के पंख हैं, जिनके सिरे पर जाली केवल अंतिम भाग में सिमटी होती है, जिससे उड़ते समय यह ऐसा दिखता है जैसे दो बड़ी मक्खियाँ एक काले पक्षी का पीछा कर रही हों। इसका वजन लगभग 0.0858 किलोग्राम होता है और इसके माथे से मुकुट तक घुंघराले क्रेस्ट पंख निकलते हैं, जिनकी लंबाई उपजाति के अनुसार भिन्न होती है।
पूर्वी हिमालय में इसे लघु रैकेट-पूंछ ड्रोंगो से भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन उस प्रजाति में चपटी रैकेट होती है और क्रेस्ट लगभग अनुपस्थित होता है। इसकी कई उपजातियाँ हैं — दक्षिण भारत की मूल उपजाति, श्रीलंका की ceylonicus, हिमालय की सबसे बड़ी grandis जिसमें लंबी चमकदार गर्दन की पंख-लटें होती हैं, और अंडमान व निकोबार द्वीपों की otiosus व nicobariensis जिनमें क्रेस्ट और गर्दन की लटों में भिन्नता पाई जाती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों में चोंच के आकार, क्रेस्ट की लंबाई, गर्दन की लटों और पूंछ की रैकेट में काफी भिन्नता देखी जाती है — कुछ उपजातियों में क्रेस्ट लगभग नहीं होता, जैसे बोर्नियो की brachyphorus या बांग्गाई की banguey। युवा पक्षी फीके रंग के होते हैं और क्रेस्ट रहित हो सकते हैं, जबकि पंख बदलते समय लंबी पूंछ की धारियाँ अनुपस्थित हो सकती हैं।
वितरण और आवास
इसका वितरण पश्चिमी हिमालय से पूर्वी हिमालय और मिशमी पहाड़ियों तक, 1,200 मीटर से नीचे की तराई में फैला है, साथ ही प्रायद्वीपीय भारत की पहाड़ियों और पश्चिमी घाट में भी यह पाया जाता है, और आगे बोर्नियो व जावा के द्वीपों तक इसका फैलाव है। इसकी वितरण सीमा लगभग 60,00,000 वर्ग किलोमीटर मानी जाती है।
यह नम पतझड़ी वनों, हिमालय की निचली पहाड़ियों और खुले मैदानों जैसे विविध आवासों में रहता है, तथा समुद्र तल से लेकर लगभग 2,000 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है, जिसमें औसत ऊँचाई लगभग 1,500 मीटर रहती है। इसकी आबादी हिमालय की तराइयों में सबसे घनी पाई जाती है।
यह पक्षी स्थानबद्ध (गैर-प्रवासी) है, जो साल भर एक ही क्षेत्र में रहता है।

व्यवहार और जीवनशैली
यह पक्षी प्रायः मिश्रित प्रजातियों के शिकार-समूहों में देखा जाता है, जिनमें मुख्यतः जंगल बब्लर जैसे पक्षी शामिल होते हैं। यह अकेले, जोड़ों में या छोटे समूहों में रहता है और अपने क्षेत्र की रक्षा में बहुत आक्रामक होता है, विशेष रूप से घोंसले के समय बड़े पक्षियों को भी घेर लेता है।
इसकी उड़ान अन्य ड्रोंगो की तरह ही गोता लगाने और छोटी-छोटी फड़फड़ाहटों के बाद सरकने वाली होती है, और पूंछ की रैकेट उड़ान के दौरान एक लगातार गुनगुनाती आवाज़ पैदा करती है। यह भोर से लगभग चार बजे ही बोलना शुरू कर देता है और शाम ढलने तक सक्रिय रहता है।
मिश्रित झुंडों में यह कभी-कभी दूसरे पक्षियों द्वारा पकड़े गए कीटों को छीन लेता है, और कुछ स्थानों पर यह लाफिंगथ्रश जैसे पक्षियों पर परजीवी की तरह व्यवहार करता पाया गया है, हालाँकि अधिकतर संबंध सहजीवी या सहभोजी प्रकार के होते हैं। इसे कठफोड़वों के साथ चारा खोजते और एक बार बंदरों के झुंड के पीछे चलते भी देखा गया है।
संचार
इसके पास घंटी जैसी आवाज़ों, सीटियों, मधुर स्वरों और धात्विक ध्वनियों का विस्तृत भंडार है, जो अधिकांश ड्रोंगो प्रजातियों में सामान्य है। यह दृश्य और ध्वनि दोनों माध्यमों से संवाद करता है, और इसकी नकल करने की क्षमता मिश्रित शिकार-झुंडों में यात्रा करते समय बहुत उपयोगी साबित होती है, जहाँ यह दूसरी प्रजातियों के साथ घुलमिल जाता है।
यह अन्य पक्षियों की चेतावनी आवाज़ों की नकल सही संदर्भ में करने में सक्षम है, जो मिश्रित झुंडों में बातचीत के माध्यम से सीखा जाता है। शिकरा जैसे शिकारी की उपस्थिति में इसकी एक विशेष चेतावनी आवाज़ दर्ज की गई है, जो इसे अन्य छोटे पक्षियों को सतर्क करने और भ्रम के बीच शिकार छीनने में मदद करती है।
शिकार और आहार
यह मुख्यतः उड़ते हुए कीटों को बीच हवा में पकड़ता है या सतहों से उठाता है, जिसमें चींटियाँ, मक्खियाँ, भिड़, भृंग, ड्रैगनफ्लाई, लोकस्ट, मैंटिड और दीमक शामिल हैं। पकड़े गए शिकार को यह अपने पंजों में पकड़कर घोंसले तक ले जाता है।
कीटों के अलावा यह फूलों के पास जाकर मधुरस (नेक्टर) भी पीता है और फल भी खाता है, जिससे इसका आहार मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तत्वों का मिश्रण बनता है। छोटे पैर होने के कारण यह सीधे खड़े होकर ऊँची और खुली शाखाओं पर बैठना पसंद करता है, जहाँ से यह उड़ते कीटों पर झपट्टा मार सके।
घोंसला और प्रजनन
यह पक्षी प्रजनन काल में एकांगी जोड़े बनाता है, और प्रजनन का समय क्षेत्र के अनुसार बदलता है — उत्तरी क्षेत्रों में यह जून-जुलाई में बाद में होता है, जबकि दक्षिणी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में फरवरी के आसपास ही शुरू हो जाता है। भारत में सामान्यतः यह अप्रैल से अगस्त तक रहता है।
घोंसला तश्तरी के आकार का होता है, जो जड़ों और पत्तियों को बारीकी से बुनकर बनाया जाता है, मकड़ी के जाल से जोड़ा जाता है और लाइकेन से छिपाया जाता है। यह प्रायः दो शाखाओं के क्षैतिज कांटे पर, अक्सर चिकनी छाल वाले अलग-थलग छतरी वाले पेड़ पर बनाया जाता है, और जोड़ा कभी-कभी तने की छाल को चिकना करने के लिए भी हटाता है।
अंडों की संख्या सामान्यतः तीन से चार होती है, जो मटमैले सफेद रंग के होते हैं और लाल-भूरे धब्बों से युक्त होते हैं, जो चौड़े सिरे पर अधिक घने होते हैं। अंडे सेने में लगभग 15 से 17 दिन लगते हैं और चूज़े लगभग 17 से 28 दिन में उड़ने लगते हैं। माता-पिता दोनों घोंसला बनाने, सेने और चूज़ों की देखभाल में भाग लेते हैं, और स्वतंत्र होने के बाद भी लगभग चार से छह सप्ताह तक अपने बच्चों पर नज़र रखते हैं।
आबादी और पारिस्थितिक भूमिका
यह पक्षी अपने पर्यावास में कीटों की बड़ी संख्या का शिकार करके एक प्रमुख शिकारी की भूमिका निभाता है, जिससे कीट आबादी नियंत्रित रहती है। इसके साथ ही, मधुरस पीने की आदत के कारण यह कुछ पौधों के परागण में भी सहायक होता है।
संरक्षण और खतरे
IUCN रेड लिस्ट में इसे 'सबसे कम चिंताजनक' श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि वर्तमान में यह विलुप्ति के खतरे में नहीं माना जाता। इसे किसी विशेष संरक्षण कानून या CITES सूची के अंतर्गत भी कोई विशेष दर्जा नहीं दिया गया है।
सांस्कृतिक महत्व
भारत के कई हिस्सों में इसकी सामान्य सीटी जैसी आवाज़ के कारण इसे 'कोतवाल' कहा जाता है, जो पुलिस या चौकीदार का संकेत देता है, क्योंकि उनकी सीटी भी इसी तरह की ध्वनि उत्पन्न करती थी। कुछ स्थानों पर इसे 'भीमराज' या 'भृंगराज' भी कहा जाता है। पूर्वोत्तर भारत की मिज़ो भाषा में इसे 'वाकुल' कहा जाता है, और मिज़ो लोग इसकी पूंछ के पंखों का उपयोग अपने समारोहों में करते हैं।
1950 के दशक से पहले भारत के कई हिस्सों में इसे बंदी अवस्था में भी रखा जाता था, क्योंकि यह कौवे की तरह ही कठोर प्रकृति का और विविध आहार अपनाने में सक्षम माना जाता था। एडवर्ड एच. शेफर ने इस ड्रोंगो को चीनी और जापानी बौद्ध ग्रंथों में वर्णित दिव्य 'कलविंक' पक्षी का आधार माना है।
रोचक तथ्य
- इसका वैज्ञानिक नाम पहली बार 1766 में कार्ल लिनियस द्वारा Cuculus paradiseus के रूप में दर्ज किया गया था, जो आज के वर्गीकरण से भिन्न है।
- इस पक्षी की पूंछ की रैकेट वास्तव में पंख के भीतरी हिस्से से बनती है, लेकिन डंठल में मौजूद एक मोड़ के कारण यह बाहरी हिस्से जैसी दिखाई देती है।
फ़ोटो
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पारिस्थितिकी और वर्गीकरण
वर्गीकरण
- संघ
- Chordata
- वर्ग
- Aves
- गण
- Passeriformes
- कुल
- Dicruridae
- वंश
- Dicrurus
- प्रजाति
- Dicrurus paradiseus
स्रोत
- GBIF Species names and classification
- iNaturalist Photos
- Wikidata Common names and conservation status
- Wikipedia Summary extract
- Encyclopedia of Life Habitat, diet and behavior traits
- Animal Diversity Web Animal habitat, behavior and diet
- AVONET Bird mass, habitat, migration, diet and range size



