सामग्री पर जाएँ
लेख पर जाएँ

जिन्को बाइलोबा

Ginkgo biloba

पंखे के आकार के हरे और शरद ऋतु में सुनहरे पत्तों वाला एक विशाल जिन्को बाइलोबा वृक्ष, जिसकी शाखाएँ ऊँची और अनियमित हैंफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

एक नज़र में

इसके लिए जाना जाता है
वनपर्वतशहरीवृक्ष
वर्गीकरण
संघ
Tracheophyta
वर्ग
Ginkgoopsida
गण
Ginkgoales
कुल
Ginkgoaceae
वंश
Ginkgo
प्रजाति
Ginkgo biloba

जिन्को बाइलोबा (Ginkgo biloba) जिन्कोएलीज़ गण की एकमात्र जीवित प्रजाति है, और यह गण 29 करोड़ वर्ष से भी पहले प्रकट हुआ था। आधुनिक प्रजाति से मिलते-जुलते जीवाश्म जिन्को वंश के मध्य जुरासिक काल, यानी लगभग 17 करोड़ वर्ष पूर्व, तक पाए जाते हैं।

यह पूर्वी एशिया का मूल निवासी एक जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी) वृक्ष है। मानव इतिहास में इसकी खेती बहुत प्राचीन काल से होती रही है, और आज भी यह विश्व भर में सजावटी वृक्ष के रूप में व्यापक रूप से लगाया जाता है, इसीलिए इसे प्रायः 'जीवित जीवाश्म' कहा जाता है।

इसकी असाधारण दीर्घजीविता, अद्वितीय पत्ती-संरचना और लाखों वर्षों की भूवैज्ञानिक यात्रा इसे वनस्पति जगत का एक विशेष अध्याय बनाती है, जिसके बारे में जानना किसी भी प्रकृति-प्रेमी के लिए रोचक है।

पहचान और रूप

जिन्को की सबसे पहचान योग्य विशेषता इसकी पंखे के आकार की पत्तियाँ हैं, जिनकी शिराएँ आधार से निकलकर बार-बार दो-दो भागों में बँटती हैं (द्विशाखी शिरा-विन्यास) परन्तु कभी आपस में जालनुमा जुड़ती नहीं। बीज वाले पौधों में यह विन्यास अद्वितीय है।

यह एक बड़ा वृक्ष है, जो सामान्यतः 20 से 35 मीटर ऊँचा होता है, जबकि चीन में कुछ नमूने 40 मीटर से भी अधिक ऊँचे पाए गए हैं। युवावस्था में इसका मुकुट शंक्वाकार होता है, जो उम्र बढ़ने के साथ चौड़ा और अनियमित रूप ले लेता है। शाखाएँ लंबी और कुछ टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं, जबकि जड़ें गहरी होने के कारण वृक्ष हवा और बर्फ के दबाव को सहन कर लेता है।

पत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं - लंबी शाखाओं पर बिखरी हुई पत्तियाँ अधिक मोटी होती हैं और तेज़ प्रकाश-संश्लेषण करती हैं, जबकि छोटी 'स्पर शूट' पर गुच्छों में उगी पत्तियाँ सूखे को बेहतर सहन करती हैं। पत्तियाँ सामान्यतः 5 से 10 सेंटीमीटर, कभी-कभी 15 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं और शरद ऋतु में गहरे केसरिया-पीले रंग में बदल जाती हैं, जो अक्सर मात्र एक से पंद्रह दिनों के भीतर झड़ जाती हैं।

नर और मादा वृक्ष बाहरी रूप से लगभग समान दिखते हैं; अंतर केवल प्रजनन संरचनाओं में स्पष्ट होता है। यह वृक्ष रोगों और कीड़ों के प्रति प्रतिरोधी है, इसकी लकड़ी कीट-रोधी होती है, और कुछ पुराने नमूनों की आयु 3,500 वर्ष से अधिक आँकी गई है।

वितरण और आवास

जिन्को बाइलोबा मूल रूप से पूर्वी चीन का निवासी है, जहाँ यह विरल रूप से चौड़ी-पत्ती वाले वनों और घाटियों में, अम्लीय, अच्छी जल-निकासी वाली पीली लोएस मिट्टी (पीएच 5.0 से 5.5) पर, समुद्र तल से 300 से 1,100 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है।

यह अशांत या विक्षोभित स्थलों को पसंद करता है, जैसे नदी-नालों के किनारे, चट्टानी ढलानें और खड़ी चट्टानों के किनारे, जहाँ जल-निकासी अच्छी रहती है।

दीर्घकाल तक इसे प्राकृतिक रूप से विलुप्त माना जाता रहा, परन्तु आज यह पूर्वी चीन, कोरिया और जापान में सामान्यतः लगाया जाने वाला वृक्ष है। इन क्षेत्रों में उच्च आनुवंशिक एकरूपता पाई जाती है, जिससे कुछ विद्वान मानते हैं कि लगभग एक हज़ार वर्षों से चीनी भिक्षुओं द्वारा इसे रोपा और संरक्षित किया गया। दक्षिण-पश्चिमी चीन की आबादियों में अधिक आनुवंशिक विविधता मिलती है, जो पूर्वी तिब्बती पठार के आसपास के पहाड़ों में हिमकालीन शरण-स्थलों की ओर संकेत करती है, जहाँ कुछ पुराने वृक्ष सचमुच जंगली हो सकते हैं।

GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़े - जो केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, संख्या या सम्पूर्ण वितरण नहीं - अगस्त और अक्टूबर के महीनों में सर्वाधिक (क्रमशः लगभग 4,695 और 4,997) दर्ज होते हैं, जबकि जनवरी-फरवरी में यह संख्या बहुत कम रहती है। यह प्रवृत्ति शरद ऋतु में इसके स्पष्ट पीले पत्तों के कारण अधिक अवलोकन दर्ज होने का संकेत दे सकती है, न कि वास्तविक जनसंख्या परिवर्तन का।

Ginkgo biloba के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
4,997
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

प्रजनन और जीवन चक्र

जिन्को बाइलोबा द्विलिंगी नहीं बल्कि द्वि-यौन (dioecious) पौधा है - अर्थात कुछ वृक्ष नर होते हैं और कुछ मादा। नर वृक्षों पर छोटे पराग शंकु बनते हैं, जिन पर बीजाणुपत्र सर्पिल क्रम में लगे होते हैं और प्रत्येक में दो सूक्ष्मबीजाणुकोष होते हैं। कभी-कभी एक ही वृक्ष की शाखाएँ लिंग परिवर्तन भी कर लेती हैं, हालाँकि यह दुर्लभ घटना है। मादा वृक्ष शंकु नहीं बनाते; इसके स्थान पर एक डंडी के सिरे पर दो अंडप बनते हैं।

निषेचन वायु-परागण के माध्यम से होता है, परन्तु असामान्य रूप से गतिशील शुक्राणुओं द्वारा - जैसा साइकैड, फर्न, मॉस और शैवाल में होता है। इन शुक्राणुओं की खोज सबसे पहले जापानी वनस्पति-वैज्ञानिक साकुगोरो हिरासे ने 1896 में की थी। निषेचन और भ्रूण-विकास आमतौर पर शरद ऋतु के आरम्भ में, अंडप के वृक्ष से गिरने से ठीक पहले या ठीक बाद होता है।

निषेचन के बाद अंडप फल जैसी संरचना में विकसित हो जाते हैं, जो 1.5 से 2 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। इनका बाहरी आवरण (सार्कोटेस्टा) मुलायम, गूदेदार और पीले-भूरे रंग का होता है, जिसमें ब्यूटिरिक अम्ल पाया जाता है और गिरने पर यह सड़े मक्खन जैसी दुर्गंध देता है। इस आवरण के भीतर कठोर स्क्लेरोटेस्टा (बीज का 'कवच') होता है। यह दुर्गंध ग्रे गिलहरी और पूर्वी एशिया में पाम सिवेट व रैकून डॉग जैसे छोटे स्तनधारियों को आकर्षित करती है, जो फल खाकर बीजों को मल के माध्यम से फैलाते हैं, क्योंकि कठोर आवरण पाचन तंत्र में सुरक्षित रह जाता है।

पारिस्थितिकी और संबंध

जिन्को बाइलोबा संवहनी पौधों में एक अनोखी विशेषता रखता है - यह एकमात्र ज्ञात संवहनी पौधा है जो Cocomyxa जैसी सूक्ष्म हरी शैवाल को अंतःसहजीवी (एंडोसिम्बायंट) के रूप में आश्रय देता है। यह सहजीविता वंशानुगत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती है और एशिया, उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप के जिन्को वृक्षों में पाई गई है। यह शैवाल कोशिकाओं के भीतर अपरिपक्व अवस्था में रहती है, जहाँ इसमें क्रियाशील क्लोरोप्लास्ट नहीं होता, इसलिए यह प्रकाश-संश्लेषण नहीं करती, परन्तु माना जाता है कि यह वृक्ष की चयापचय प्रक्रियाओं में कुछ भूमिका निभाती है।

अपने प्राकृतिक निवास में जिन्को विक्षोभित स्थलों को प्राथमिकता देता है - जैसे नदी-किनारे, चट्टानी ढलानें और खड़ी चट्टानें। इसकी वानस्पतिक वृद्धि क्षमता उल्लेखनीय है: भूमि-क्षरण जैसे व्यवधानों के बाद यह तने के आधार के पास स्थित कलियों से नई शाखाएँ (लिग्नोट्यूबर) निकाल सकता है, और पुराने वृक्ष क्षतिग्रस्त शाखाओं के नीचे हवाई जड़ें बना सकते हैं, जो मिट्टी के संपर्क में आकर नए क्लोन वृक्ष के रूप में विकसित हो जाती हैं। तियानमु पर्वत के अर्ध-जंगली वृक्षों के एक सर्वेक्षण में 40 प्रतिशत नमूने बहु-तना वाले पाए गए, जबकि नए पौध बहुत कम मिले - यह इस प्रजाति की टिकाव-रणनीति को दर्शाता है।

उपयोग और मानव संबंध

चीनी संस्कृति में जिन्को को दीर्घायु, जीवन-शक्ति और पवित्र जीवन-ऊर्जा 'ची' का प्रतीक माना जाता है। यह वृक्ष रात में फूलता है और शीघ्र ही अपने फूल गिरा देता है, जिसे यिन-यांग संतुलन का प्रतीक माना जाता है।

कोरिया में, प्राचीन मंदिरों में स्थित जिन्को वृक्षों को पवित्र भूमि के जीवित संरक्षक के रूप में देखा जाता है, और कुछ को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी गई है। बौद्ध और कन्फ्यूशियस परंपराओं में भिक्षु ध्यान और सूत्र-अध्ययन के दौरान स्पष्ट, स्थिर जागरूकता के लिए जिन्को की पत्तियों से बनी चाय का उपयोग करते थे; आज पश्चिमी देशों में भी यह ध्यान और मानसिक अभ्यास से जुड़े उपयोगों में लोकप्रिय है।

चीन में इसकी खेती सदियों से होती रही है, और कुछ मंदिरों के वृक्ष 1,500 वर्ष से अधिक पुराने माने जाते हैं। यह वृक्ष प्रदूषण के प्रति अत्यंत सहनशील है, इसलिए इसे शहरों में छाया देने वाले सड़क-वृक्ष के रूप में व्यापक रूप से लगाया जाता है। क्योंकि मादा वृक्षों के फल दुर्गंधयुक्त होते हैं, बागवानी में अक्सर नर कलमों (जैसे 'ऑटम गोल्ड') का प्रयोग किया जाता है, हालाँकि नर वृक्षों का पराग अत्यधिक एलर्जीकारी होता है (OPALS मान 7, जबकि मादा वृक्षों का मान केवल 2 है)। 'लिबर्टी स्प्लेंडर', 'सांता क्रूज़' और 'गोल्डन गर्ल' जैसी मादा किस्मों से कोई पराग नहीं निकलता। जिन्को बोन्साई और 'पेनजिंग' लघु-भूदृश्य कला में भी लोकप्रिय है। हिरोशिमा में 1945 के परमाणु बम विस्फोट स्थल से एक से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित छह जिन्को वृक्ष, जले हुए बावजूद, जीवित बचे रहे और आज भी खड़े हैं। 2016 से जिन्को बाइलोबा के अर्क को अंतरराष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी (IARC) द्वारा संभावित मानव कार्सिनोजन (समूह 2B) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

संरक्षण और खतरे

जिन्को के जीवाश्म रिकॉर्ड से पता चलता है कि यह वंश जुरासिक और आरंभिक क्रिटेशियस काल में लॉरेशिया भर में फैला और विविध हुआ, परन्तु क्रिटेशियस काल के आगे बढ़ने के साथ-साथ इसकी विविधता घटती चली गई। पैलियोसीन युग तक उत्तरी गोलार्ध में केवल एक प्रजाति, Ginkgo adiantoides, ही शेष रह गई थी, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में एक भिन्न और कम प्रलेखित रूप बचा हुआ था।

यह गिरावट फर्न, साइकैड और साइकैडेओइड जैसे अन्य प्राचीन समूहों में भी दिखी, ठीक उस समय जब फूल वाले पौधे उभर रहे थे - इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि विक्षोभ के प्रति बेहतर अनुकूलन रखने वाले फूल वाले पौधों ने समय के साथ जिन्को और उसके सहयोगी समूहों का स्थान ले लिया।

प्लायोसीन युग के अंत तक जिन्को के जीवाश्म विश्व में हर जगह से लुप्त हो गए, सिवाय मध्य चीन के एक छोटे से क्षेत्र के, जहाँ आधुनिक प्रजाति बची रह गई। यही कारण है कि इसे लंबे समय तक प्रकृति में विलुप्त माना जाता रहा, और आज जो भी वृक्ष विश्व भर में दिखते हैं, वे मुख्यतः मानव द्वारा रोपे और संरक्षित किए गए वंशजों के परिणाम हैं।

रोचक तथ्य

  1. हिरोशिमा में 1945 के परमाणु बम विस्फोट स्थल से मात्र एक से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित छह जिन्को वृक्ष जले हुए बावजूद बच गए और आज भी जीवित हैं।
  2. जिन्कोएलीज़ गण, जिसका जिन्को अंतिम जीवित सदस्य है, 29 करोड़ वर्ष से भी पहले अस्तित्व में आया था, और आधुनिक प्रजाति से मिलते जीवाश्म मध्य जुरासिक काल यानी लगभग 17 करोड़ वर्ष पूर्व तक मिलते हैं।
  3. यह एकमात्र ज्ञात संवहनी पौधा है जो Cocomyxa जैसी सूक्ष्म हरी शैवाल को अंतःसहजीवी के रूप में आश्रय देता है।
  4. जिन्को के शुक्राणुओं की खोज सबसे पहले जापानी वनस्पति-वैज्ञानिक साकुगोरो हिरासे ने 1896 में की थी।
  5. जिन्को की पत्ती टोक्यो विश्वविद्यालय और दक्षिण कोरिया के सुंगक्युनक्वान विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों का प्रतीक-चिह्न है।
  6. वर्ष 2016 से जिन्को बाइलोबा के अर्क को अंतरराष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी द्वारा संभावित मानव कार्सिनोजन (समूह 2B) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  7. कोरिया और चीन के कुछ मंदिरों में स्थित प्राचीन जिन्को वृक्षों को जीवित सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है, जिनमें से कुछ 1,400 वर्ष से अधिक पुराने हैं।

पारिस्थितिकी

आवास

  • वन
  • पर्वत
  • शहरी

वृद्धि का रूप

  • वृक्ष

फ़ोटो

20 फ़ोटो
1 / 20
पंखे के आकार के हरे और शरद ऋतु में सुनहरे पत्तों वाला एक विशाल जिन्को बाइलोबा वृक्ष, जिसकी शाखाएँ ऊँची और अनियमित हैंफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipediaEncyclopedia of Life