Parmelia squarrosa, जिसे वैज्ञानिक रूप से इसी नाम से जाना जाता है, लंबे समय तक इसकी नज़दीकी प्रजाति Parmelia saxatilis के साथ भ्रमित किया जाता रहा, विशेषकर संग्रहालयों के हर्बेरियम संग्रहों में। आनुवंशिक विश्लेषण ने अंततः साबित किया कि दोनों प्रजातियाँ वास्तव में अलग हैं, और इन्हें इनकी जड़नुमा संरचनाओं (राइज़ीन) की बनावट के आधार पर पहचाना जा सकता है।
यह एक पत्तीनुमा लाइकेन है जो कवक संघ Ascomycota और परिवार Parmeliaceae से संबंधित है। यह पूर्वी एशिया, यूरोप और पूर्वी उत्तर अमेरिका में पाया जाता है, जहाँ यह मुख्य रूप से पेड़ों की छाल पर, कम बार चट्टानों पर और शायद ही कभी काई पर उगता है। अपनी प्रचुरता, व्यापक वितरण और स्थिर जनसंख्या के कारण इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा न्यूनतम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है।
इस लाइकेन की पहचान की कहानी यह दिखाती है कि दिखने में एक जैसे लगने वाले जीव भी आनुवंशिक रूप से कितने भिन्न हो सकते हैं, और यह विज्ञान की उस यात्रा का हिस्सा है जो दिखावे से परे जाकर सच्चाई खोजती है।
फलन काय और पहचान
इस लाइकेन की सबसे विश्वसनीय पहचान इसकी राइज़ीन (जड़नुमा संरचनाएँ) की शाखाओं वाली बनावट है, जो बीच से झाड़ीनुमा शाखाओं में बँटी होती हैं जबकि पालि (लोब) के किनारों पर ये सरल रहती हैं। यही विशेषता इसे निकट संबंधी Parmelia saxatilis से अलग करती है।
इसका थैलस पेड़ों पर चिपका हुआ से लेकर ढीला-चिपका हुआ होता है, और कम बार यह चट्टानों पर पाया जाता है। रंग हरापन लिए सफेदी-भूरे से लेकर खनिज-सलेटी तक होता है, और इसकी पालियाँ 1 से 5 मिलीमीटर चौड़ी, आपस में सटी या एक-दूसरे पर चढ़ी हुई होती हैं। ऊपरी सतह समतल से लेकर गड्ढेदार होती है, जिस पर जालीनुमा पैटर्न बनाते हुए सूक्ष्म छिद्र (स्यूडोसाइफेली) फैले रहते हैं।
थैलस पर बेलनाकार आइसिडिया उभरे रहते हैं, जो 0.5 मिलीमीटर तक ऊँचे होते हैं और थैलस के पुराने, मध्य भाग में घने हो जाते हैं। फलनकाय (पाइक्निडिया और एपोथीशिया) कम ही देखे जाते हैं; जब बीजाणु बनते हैं तो वे 13 से 15 माइक्रोमीटर लंबे और 8 से 9 माइक्रोमीटर चौड़े होते हैं। इस लाइकेन में एट्रानोरिन, सैलाज़िनिक एसिड और कॉनसैलाज़िनिक एसिड जैसे रासायनिक यौगिक पाए जाते हैं, जिनकी पहचान मानक रासायनिक परीक्षणों से होती है।
वितरण और आवास
Parmelia squarrosa का वितरण उत्तरी अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया तक फैला है। उत्तरी अमेरिका में यह मुख्यतः पूर्वी क्षेत्र में, विशेषकर ग्रेट लेक्स-एपलेशियन क्षेत्र में पाया जाता है, साथ ही पश्चिमी उत्तरी अमेरिका में भी इसकी उपस्थिति दर्ज है। यह Parmelia saxatilis की तुलना में अधिक समशीतोष्ण और दक्षिणी क्षेत्रों में फैला है, इसका विस्तार दक्षिण में अर्कांसस, अलाबामा और दक्षिण कैरोलिना तक जाता है। ग्रेट लेक्स से न्यूयॉर्क, न्यू इंग्लैंड होते हुए क्यूबेक और न्यूफ़ाउंडलैंड तक के क्षेत्रों में इसका वितरण P. saxatilis के साथ मिलता-जुलता है। दक्षिणी एपलेशियन क्षेत्र में, P. saxatilis और P. sulcata के विपरीत जो ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित हैं, यह निचली तलहटियों तक भी फैला है।
यूरोप में इसे पहली बार 1985 में पश्चिमी ऑस्ट्रियाई आल्प्स और दक्षिणी स्विट्ज़रलैंड में चट्टानों पर उगते हुए दर्ज किया गया। पूर्वी एशिया में यह जापान, चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, रूसी सुदूर पूर्व और नेपाल में व्यापक रूप से पाया जाता है। नेपाल में इसे 3,000 से 3,800 मीटर की ऊँचाई पर दर्ज किया गया है।
यह लाइकेन मुख्यतः आर्द्र वनों में उगता है, विशेषकर तटीय क्षेत्रों के निकट वाले वनों में, और इसे शंकुधारी व पर्णपाती दोनों प्रकार के पेड़ों पर देखा गया है। उपलब्ध अवलोकन आँकड़ों में गर्मी के महीनों, विशेषकर जुलाई के आसपास, अधिक दर्ज संख्याएँ दिखती हैं, जो इस अवधि में इसकी उपस्थिति के दर्ज होने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं, न कि इसकी वास्तविक जनसंख्या या बहुतायत को।

संरक्षण और खतरे
वर्ष 2021 में Parmelia squarrosa का अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची के लिए आकलन किया गया। चूँकि यह लाइकेन सामान्य, प्रचुर और व्यापक रूप से वितरित है तथा इसकी जनसंख्या स्थिर बनी हुई है, इसे न्यूनतम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है।
हालाँकि, एक प्रत्यारोपण अध्ययन में, जब इस लाइकेन वाली छाल के टुकड़ों को क्यूबेक के एक प्रदूषणरहित क्षेत्र से एक तांबा गलाने वाली भट्टी के निकट प्रदूषित क्षेत्र में ले जाया गया, तो 4 और 12 महीनों के संपर्क के दौरान इसमें रंग में परिवर्तन, सतह से अलगाव, दरारें, आइसिडिया में कमी, जैवभार और क्लोरोफिल में गिरावट जैसे प्रभाव देखे गए। भट्टी के जितना निकट प्रत्यारोपण किया गया, प्रभाव उतने ही गंभीर पाए गए।
यह अध्ययन दर्शाता है कि भले ही प्रजाति वर्तमान में सुरक्षित मानी जाती है, औद्योगिक प्रदूषण स्थानीय स्तर पर इसके स्वास्थ्य और संरचना पर स्पष्ट प्रभाव डाल सकता है।
रोचक तथ्य
- यह लाइकेन मृत व जीवित लकड़ी, पेड़ों की छाल और शाखाओं के साथ-साथ चट्टानों व कंकड़-पत्थरों पर भी उग सकता है, जो इसकी सतह अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
- इसका वितरण आर्कटिक क्षेत्रों से लेकर यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका (मेक्सिको सहित) तक फैला हुआ दर्ज किया गया है।
- यह एक सहजीवी (लाइकेनीकृत) जीव है, जिसका अर्थ है कि यह एक कवक और एक प्रकाश-संश्लेषक साझेदार के परस्पर लाभकारी संबंध से बनता है।
फ़ोटो
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पारिस्थितिकी और वर्गीकरण
वर्गीकरण
- संघ
- Ascomycota
- वर्ग
- Lecanoromycetes
- गण
- Lecanorales
- कुल
- Parmeliaceae
- वंश
- Parmelia
- प्रजाति
- Parmelia squarrosa
स्रोत
- GBIF Species names and classification
- iNaturalist Photos
- Wikidata Common names and conservation status
- Wikipedia Summary extract



