किसी वयस्क व्यक्ति की जान लेने के लिए Amanita phalloides के मात्र 30 ग्राम गूदे — यानी टोपी के आधे हिस्से से भी कम — पर्याप्त हैं। यही तथ्य इस फफूंद को विश्व में मशरूम विषाक्तता से होने वाली सबसे अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार बनाता है।
सामान्य रूप से 'मृत्यु टोपी' के नाम से जानी जाने वाली यह प्रजाति बेसिडियोमाइकोटा संघ, एगारिकेलीज़ गण और एमानिटेसी कुल की सदस्य है। मूलतः यूरोप की निवासी, यह विभिन्न चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों के साथ एक्टोमाइकोराइज़ल संबंध बनाती है, और बीसवीं सदी के अंत से ओक, चेस्टनट तथा पाइन जैसी गैर-देशी वृक्ष प्रजातियों की खेती के साथ दुनिया के अन्य हिस्सों में भी पहुँच गई है। इसके बड़े फलनकाय ग्रीष्म और शरद ऋतु में उगते हैं, टोपी सामान्यतः हरे रंग की तथा स्टाइप और गिल्स सफेद होते हैं, हालाँकि टोपी का रंग बदलता रहता है और सफेद रूप भी पाया जाता है, जिससे रंग को पहचान का भरोसेमंद आधार नहीं माना जा सकता।
इसकी सुंदर परंतु भ्रामक बनावट और खाने योग्य प्रजातियों से मिलती-जुलती आकृति इसे कवकविज्ञान के इतिहास की सबसे चर्चित और सावधानी बरतने योग्य प्रजातियों में शामिल करती है।
फलन काय और पहचान
इस फफूंद की सबसे भरोसेमंद पहचान इसके आधार पर छिपी थैलीनुमा वोल्वा में है, जो अक्सर पत्तियों के कचरे के नीचे दबी रहती है और जिसे देखने के लिए मिट्टी हटानी पड़ती है। यह सूजी हुई, फटी-फटी सफेद संरचना पहचान की दृष्टि से निर्णायक मानी जाती है।
टोपी (पाइलियस) प्रारंभ में गोल और अर्धगोलाकार होती है, आयु के साथ चपटी हो जाती है, तथा 5 से 15 सेंटीमीटर व्यास तक पहुँचती है। इसका रंग हल्के हरे, पीले-हरे, जैतूनी हरे या कांसई रंग से लेकर, एक रूप में पूर्णतः सफेद तक बदलता है; किनारों की ओर रंग हल्का पड़ जाता है और वहाँ गहरी धारियाँ दिख सकती हैं। सतह नम होने पर चिपचिपी रहती है और आसानी से छिलती है — एक ऐसा गुण जिसे कई लोग भ्रामक रूप से खाने योग्य फफूंद का संकेत मान लेते हैं।
गिल्स (लैमेली) घनी, सफेद और स्वतंत्र होती हैं। स्टाइप 8 से 15 सेंटीमीटर लंबा और 1 से 2 सेंटीमीटर मोटा, सफेद रंग का होता है जिस पर धूसर-जैतूनी छिलकेदार धब्बे बिखरे रहते हैं। टोपी से लगभग 1 से 1.5 सेंटीमीटर नीचे आंशिक वील का अवशेष एक ढीले, स्कर्टनुमा वलय (एन्युलस) के रूप में दिखता है। गंध शुरू में हल्की और शहद जैसी मीठी होती है, परंतु समय के साथ तीव्र, चिपचिपी-मीठी और असहनीय हो जाती है। बीजाणु-मुद्रण सफेद होता है और बीजाणु 7 से 12 गुणा 6 से 9 माइक्रोमीटर आकार के, चिकने, अंडाकार तथा आयोडीन-अभिक्रियाशील होते हैं। युवा नमूने भूमि से एक सफेद अंडे जैसी संरचना के रूप में निकलते हैं, जो सार्वभौमिक वील से ढकी होती है; यह वील टूटने पर वोल्वा के रूप में अवशेष छोड़ जाती है।
वितरण और आवास
Amanita phalloides मूलतः यूरोप की प्रजाति है, जहाँ यह व्यापक रूप से फैली हुई है — उत्तर में स्कैंडिनेविया के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों से लेकर पश्चिम में आयरलैंड तक, पूर्व में पोलैंड और पश्चिमी रूस तक, और दक्षिण में बाल्कन क्षेत्र, ग्रीस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल तथा भूमध्यसागरीय बेसिन से मोरक्को और अल्जीरिया तक फैला हुआ है। पश्चिम एशिया में इसकी उपस्थिति उत्तरी ईरान के वनों से दर्ज की गई है।
यह मुख्यतः बीच और ओक वृक्षों वाले पर्णपाती वनों में उगती है और अम्लीय मिट्टी की ओर थोड़ा झुकाव दिखाती है; पहाड़ी क्षेत्रों में यह शंकुधारी वनों में तथा वनों के किनारे स्थित चरागाहों में भी पाई जाती है।
19वीं सदी के अंत तक यह उत्तरी अमेरिका में भी दर्ज हो चुकी थी, और 1970 के दशक तक स्पष्ट हो गया कि यह यूरोप से चेस्टनट पौधों के साथ आयातित होकर अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर स्थापित हो गई है। 2009 के एक आनुवंशिक अध्ययन ने पश्चिमी तट की आबादी के बाहरी मूल की पुष्टि की। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ओक और शंकुधारी वृक्षों के आयात के साथ यह दक्षिणी गोलार्ध के देशों — ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, चिली, उरुग्वे, तंज़ानिया और दक्षिण अफ्रीका — में भी पहुँच गई। कैलिफोर्निया के तटीय ओक वनों में इसके नमूने अक्सर पीले या सरसों जैसे रंग के पाए जाते हैं, जो स्थानीय पर्यावरणीय दबावों के कारण उत्पन्न होते हैं और स्थानीय खाने योग्य प्रजातियों Amanita velosa तथा Amanita calyptroderma से भ्रामक रूप से मिलते हैं।
GBIF की मासिक अवलोकन संख्याएँ केवल उपस्थिति दर्शाती हैं, न कि प्रजाति की वास्तविक बहुतायत या पूर्ण वितरण क्षेत्र, फिर भी आँकड़ों में अगस्त से अक्टूबर के महीनों में स्पष्ट वृद्धि दिखती है, जो फफूंद की शरद ऋतु में प्रमुख फलनकाल के अनुरूप प्रतीत होती है।

पारिस्थितिकी और संबंध
यह फफूंद कई वृक्ष प्रजातियों के साथ सहजीवी एक्टोमाइकोराइज़ल संबंध बनाती है, जिसमें यूरोप में ओक सबसे सामान्य साझेदार है, इसके अलावा बीच, चेस्टनट, हॉर्स-चेस्टनट, बिर्च, हेज़ल, हॉर्नबीम, पाइन और स्प्रूस भी शामिल हैं। जिन क्षेत्रों में यह प्रजाति आयातित हुई है, वहाँ यह सामान्यतः केवल उन्हीं विदेशी वृक्षों तक सीमित रही है जिनसे यह अपने मूल क्षेत्र में जुड़ी रहती है, जैसे कैलिफोर्निया में तटीय जीवित ओक।
हालाँकि, तंज़ानिया और अल्जीरिया में यूकेलिप्टस के साथ, और न्यूज़ीलैंड में लेप्टोस्पर्मम तथा कुंज़िया जैसी मर्टेसी कुल की प्रजातियों के साथ इसके जुड़ने के प्रमाण मिले हैं, जो इस फफूंद की संभावित आक्रामक प्रकृति की ओर इशारा करते हैं।
कीट जगत में इसका संबंध सीमित रूप से दर्ज है — इसे एक बार 'प्लीज़िंग फंगस बीटल' Rotitma sanguinipennis के भोजन के रूप में देखा गया, हालाँकि यह अभिलेख एक समान प्रजाति के साथ भ्रम का परिणाम भी माना जाता है; इसी प्रकार यह संबंधित भृंग Tritoma biguttata के वयस्कों के साथ भी देखी गई है, परंतु यह इनके लिए नियमित भोजन स्रोत प्रतीत नहीं होती।
उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास
18वीं सदी से यूरोप और अन्य क्षेत्रों में दर्ज विषाक्तता की घटनाओं ने इस फफूंद को एक कुख्यात सांस्कृतिक पहचान दी है। इसकी सामान्य दिखने वाली, यहाँ तक कि आकर्षक बनावट और छिपी घातकता के कारण यह छल या छिपे हुए खतरे के प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी है।
अधिकांश विषाक्तता की घटनाएँ पहचान में हुई गलतियों से जुड़ी हैं। पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई मूल के लोग, जो अपने मूल देशों में धान-पुआल मशरूम (Volvariella volvacea) या 'व्हाइट सीज़र' (Amanita princeps) जैसी खाने योग्य प्रजातियाँ चुनते रहे हैं, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के पश्चिमी तट पर इस भ्रम के कारण कई बार गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। जनवरी 2012 में कैनबरा में चार लोगों को इस फफूंद को धान-पुआल मशरूम समझकर खाने के बाद अस्पताल भेजा गया, जिनमें से दो की मृत्यु हो गई और एक को यकृत प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ी। ओरेगन में एक कोरियाई परिवार के चार सदस्यों को भी यकृत प्रत्यारोपण करवाना पड़ा।
विषविज्ञान में इसके अमाटॉक्सिन की पहचान के लिए 'मेइक्स्नर परीक्षण' का उपयोग किया जाता है, हालाँकि यह परीक्षण साइलोसिन, साइलोसाइबिन और कुछ अन्य ट्रिप्टामाइन यौगिकों की उपस्थिति में गलत सकारात्मक परिणाम भी दे सकता है।
रोचक तथ्य
- इस फफूंद का अपना RNA पॉलिमरेज़ अमाटॉक्सिन के प्रभाव से अप्रभावित रहता है, इसलिए यह स्वयं को कभी विषाक्त नहीं करती।
- Amanita phalloides का पूरा जीनोम अनुक्रमित किया जा चुका है।
- फैलोइडिन विष सन 1937 में फियोडोर लिनन और उलरिख वीलैंड द्वारा अलग किया गया था, जबकि अमाटॉक्सिन की पहचान 1941 में हाइनरिख वीलैंड और रुडोल्फ हॉलरमायर ने की।
- दिलचस्प बात यह है कि फैलोइडिन विष खाने योग्य फफूंद 'ब्लशर' (Amanita rubescens) में भी पाया जाता है, फिर भी वह प्रजाति खाई जाती है क्योंकि यह विष आंत से अवशोषित नहीं होता।
- बीसवीं सदी के मध्य तक इस फफूंद से विषाक्तता की मृत्यु दर 60 से 70 प्रतिशत तक थी, जो आधुनिक चिकित्सा उपचार की मदद से घटकर अब 10 से 30 प्रतिशत के बीच रह गई है।
- इसकी अंडे जैसी युवा अवस्था तथा पीली-सरसई कैलिफोर्नियाई किस्में इसे पहचान में विशेष रूप से भ्रामक बनाती हैं।
पारिस्थितिकी
आवास
- वन
- वनभूमि
- घास का मैदान



