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पश्चिमी मधु मक्खी

Apis mellifera

DDआंकड़ा-अपर्याप्त
फूल पर बैठी एक वयस्क पश्चिमी मधु मक्खी, जिसका शरीर सुनहरे-भूरे और काले धारीदार बालों से ढका है, पारदर्शी पंख हैं और पिछली टांगों पर पराग की गठरी दिखाई दे रही है।फ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

माप

जीवनकाल
≤ 8 वर्ष
वर्गीकरण
संघ
Arthropoda
वर्ग
Insecta
गण
Hymenoptera
कुल
Apidae
वंश
Apis
प्रजाति
Apis mellifera

पश्चिमी मधु मक्खी दुनिया भर में पाई जाने वाली 7 से 12 ज्ञात मधुमक्खी प्रजातियों में सबसे व्यापक और परिचित प्रजाति है। इसका वैज्ञानिक नाम Apis mellifera लैटिन शब्दों से बना है — Apis का अर्थ है 'मधुमक्खी' और mellifera का अर्थ है 'शहद ले जाने वाली', जो इसकी शहद उत्पादन क्षमता की ओर इशारा करता है।

यह कीट Insecta वर्ग, Hymenoptera गण और Apidae कुल का सदस्य है। IUCN की रेड लिस्ट में इसे 'डेटा-अपर्याप्त' श्रेणी में रखा गया है, यानी इसकी वैश्विक आबादी की स्थिति के बारे में पर्याप्त वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, भले ही यह प्रजाति संख्या में अभी भी बहुत बड़ी है।

अपने जटिल सामाजिक जीवन, रासायनिक संचार और प्रसिद्ध 'नृत्य' के जरिए दिशा बताने की क्षमता के कारण यह मक्खी दशकों से वैज्ञानिकों और आम लोगों दोनों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई है।

पहचान और रूप

Apis mellifera की पहचान का सबसे स्पष्ट संकेत इसका नाम ही देता है — 'शहद-वाहक' मक्खी, जो अपने छत्ते में शहद जमा करने के लिए जानी जाती है। यह विश्व की 7 से 12 ज्ञात मधुमक्खी प्रजातियों में सबसे आम और सबसे व्यापक रूप से पाली जाने वाली प्रजाति है।

एक कॉलोनी में तीन अलग-अलग रूप देखे जाते हैं — एक प्रजननशील रानी, बड़ी संख्या में बाँझ श्रमिक मादाएं, और मौसम के अनुसार पैदा होने वाले नर (ड्रोन); इनकी भूमिका और व्यवहार एक-दूसरे से स्पष्ट रूप से भिन्न होते हैं, जैसा कि व्यवहार और प्रजनन से जुड़े विवरणों में देखा जा सकता है।

वितरण और आवास

इस प्रजाति की उत्पत्ति मूलतः अफ्रीका या एशिया में हुई मानी जाती है, जहां से यह स्वाभाविक रूप से अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप में फैली। आज यह अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर पाई जाती है। मनुष्यों ने 1600 के दशक की शुरुआत में यूरोपीय उप-प्रजातियों को उत्तरी अमेरिका में लाया, और बाद में दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और पूर्वी एशिया में भी इसका प्रसार हुआ।

यह मक्खी घास के मैदानों, खुले जंगलों, बगीचों, रेगिस्तानों, आर्द्रभूमियों और यहां तक कि शहरी व उपनगरीय क्षेत्रों में भी रह सकती है, बशर्ते वहां पानी, भोजन और आश्रय पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। घोंसला बनाने के लिए इसे खोखले पेड़ों जैसी सुरक्षित गुहाओं की आवश्यकता होती है — पालतूकरण से पहले यह जंगलों में खोखले तनों में ही छत्ता बनाती थी, और आज भी कभी-कभी पालतू छत्तों से भागी हुई कॉलोनियां मृत पेड़ों में बस जाती हैं।

GBIF के मासिक अवलोकन आंकड़े केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, आबादी का आकार नहीं। फिर भी इनका रुझान बताता है कि अप्रैल से अगस्त के बीच अवलोकन सबसे अधिक होते हैं, जुलाई में चरम पर लगभग 1,76,000 दर्ज अवलोकनों के साथ, जबकि नवंबर में यह घटकर करीब 31,000 रह जाते हैं — जो संभवतः गर्मियों में बढ़ती फूलों की उपलब्धता और अधिक बाहरी गतिविधि से जुड़ा हो सकता है।

Apis mellifera के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
1,76,638
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

व्यवहार और जीवनशैली

Apis mellifera एक अत्यंत सामाजिक कीट है जो एक ही रानी और उसकी संतानों से बने बड़े उपनिवेशों में रहती है। बाँझ मादा श्रमिक मक्खियां कॉलोनी का लगभग सारा काम करती हैं, और उनकी भूमिका उम्र के साथ बदलती रहती है — नई निकली मक्खियां कोशिकाओं की सफाई करती हैं, फिर छत्ते के रख-रखाव, रानी और लार्वा को खिलाने, मोम स्रावित कर छत्ता बनाने का काम संभालती हैं, 12 से 25 दिन की उम्र में पहरेदारी करती हैं, और लगभग तीन सप्ताह की उम्र के बाद बाहर चारा खोजने का जिम्मा लेती हैं।

छत्ते के भीतर तापमान का सटीक नियंत्रण इस प्रजाति के जीवन का केंद्र है। उड़ान के लिए शरीर को 35°C तापमान चाहिए, जो लार्वा के विकास और मोम बनाने के लिए भी आदर्श है। सर्दियों में मक्खियां और रानी एक कसकर बंधा हुआ गुच्छा बना लेती हैं और उड़ान की मांसपेशियों को हिलाकर गर्मी पैदा करती हैं, जिससे गुच्छे के भीतरी हिस्से का तापमान 20-22°C तक बना रहता है। चारा खोजने के लिए आदर्श हवा का तापमान 22-25°C है; 7-10°C से नीचे मक्खियां हिल-डुल नहीं पातीं, जबकि यह प्रजाति थोड़े समय के लिए 50°C तक की गर्मी भी सह सकती है।

स्वस्थ कॉलोनियां झुंड बनाकर प्रजनन करती हैं, जिसमें पुरानी रानी आधे श्रमिकों के साथ छत्ता छोड़कर नई जगह तलाशती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सूखे के मौसम में कॉलोनियां पूरी तरह पलायन भी कर सकती हैं, जिसे मधुमक्खी पालक 'absconding' कहते हैं। कुछ मक्खियां 'स्वच्छता व्यवहार' भी दिखाती हैं — बीमार या संक्रमित लार्वा को गंध से पहचानकर कोशिकाओं से बाहर निकाल देती हैं, जिससे वैरोआ माइट और चॉकब्रूड जैसी बीमारियों का प्रसार सीमित होता है।

संचार

Apis mellifera का अधिकांश संचार रासायनिक संकेतों यानी फेरोमोन पर आधारित है। हर छत्ते की अपनी अलग गंध-पहचान होती है, जिससे मक्खियां अपने साथी और बाहरी घुसपैठियों में फर्क कर पाती हैं। रानी की सेहत और कॉलोनी की स्थिति की जानकारी भी फेरोमोन के जरिए ही श्रमिकों तक पहुंचती है, जबकि डंक मारने पर निकलने वाला अलार्म फेरोमोन अन्य मक्खियों को सतर्क कर हमलावर की ओर आकर्षित करता है।

भोजन का पता लगाने के बाद सफल चारा खोजी मक्खी छत्ते में लौटकर नृत्य के जरिए बाकी मक्खियों को जगह बताती है। यदि फूल छत्ते से करीब 50 मीटर के भीतर हों तो 'गोल नृत्य' किया जाता है, जो केवल भोजन की मौजूदगी बताता है, दिशा नहीं। इससे अधिक दूरी के लिए 'वैगल नृत्य' का उपयोग होता है, जिसमें सूर्य की स्थिति और उड़ान की दूरी की स्मृति के आधार पर दिशा व दूरी दोनों बताई जाती हैं — कार्ल फॉन फ्रिश को इसी खोज के लिए 1973 में चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार मिला था।

मक्खियों की आंखें पराबैंगनी और ध्रुवित प्रकाश को भी पहचान सकती हैं, जिससे वे बादल भरे दिन में भी सूर्य की दिशा और फूलों पर छिपे पराबैंगनी निशान देख पाती हैं। इसके अलावा 'शेकिंग सिग्नल' नामक कंपन-आधारित संकेत भी होता है, जिससे अनुभवी चारा खोजी मक्खियां निष्क्रिय साथियों को सक्रिय होने या आराम करने का इशारा देती हैं।

आहार और भोजन की आदतें

Apis mellifera फूलों से मकरंद और पराग इकट्ठा करके अपना और पूरी कॉलोनी का भरण-पोषण करती है। श्रमिक मक्खियां अपनी जीभ से मकरंद चूसकर उसे पेट के अगले हिस्से 'क्रॉप' में जमा करती हैं, जबकि पराग को शरीर पर से झाड़कर पिछली टांगों की विशेष पराग-टोकरियों में भर लेती हैं।

छत्ते में लौटने पर चारा खोजी मक्खी मकरंद को छोटी उम्र की श्रमिकों को सौंप देती है, जो उसमें एंजाइम मिलाकर और खुली कोशिकाओं में जल वाष्पित कर उसे गाढ़े शहद में बदल देती हैं। युवा श्रमिकों द्वारा खाया गया पराग और मकरंद उनके सिर की ग्रंथियों से 'रॉयल जेली' और 'वर्कर जेली' के रूप में स्रावित होता है, जो लार्वा को खिलाई जाती है — इसी आहार की मात्रा और प्रकार से तय होता है कि लार्वा रानी बनेगा या श्रमिक।

चारा खोज केवल दिन के उजाले में होती है और मौसम पर बहुत निर्भर करती है — तेज़ बारिश, तेज़ हवा या 10°C से कम तापमान में मक्खियां उड़ान नहीं भरतीं, जबकि हल्की बारिश पराग संग्रह को रोकती है पर मकरंद संग्रह को नहीं। मौका मिलने पर मक्खियां कमजोर छत्तों से शहद चुराने या एफिड जैसे कीटों के स्रावित 'हनीड्यू' का सेवन करने में भी नहीं हिचकतीं।

फूल-दर-फूल इस निरंतर आवाजाही के दौरान ये बड़ी संख्या में परागकण एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाती हैं, जिससे यह प्रजाति दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक परागणकर्ता बन जाती है।

प्रजनन और जीवन चक्र

एक कॉलोनी में आमतौर पर केवल एक ही प्रजननशील रानी होती है, जबकि बाकी मादाएं बाँझ श्रमिक होती हैं। वसंत और गर्मियों के अनुकूल मौसम में नर छत्ते से निकलकर पास बने 'ड्रोन असेंबली क्षेत्रों' में जमा होते हैं। जब कुंवारी रानी उड़ान भरती है, तो वह फेरोमोन से नरों को आकर्षित करती है; कई नर उसका पीछा करते हैं और हवा में ही मैथुन करते हैं। रानी एक ही उड़ान में 10 नरों तक से मैथुन कर सकती है, और यह प्रक्रिया अपने जीवन में अधिकतम चार बार दोहराई जाती है — इसके बाद वह दोबारा कभी नहीं मैथुन करती। मैथुन करने वाला हर नर कुछ ही घंटों या दिनों में मर जाता है।

मैथुन के बाद रानी वर्षभर लगभग लगातार अंडे देती है, कभी-कभी ठंडी जलवायु में देर पतझड़ में रुककर। एक अत्यंत उर्वर रानी प्रतिदिन लगभग 1,000 अंडे और जीवनभर में करीब 2,00,000 अंडे दे सकती है, जो प्रति प्रजनन-मौसम लगभग 60,000 से 80,000 अंडों के बराबर बैठता है। रानी तय कर सकती है कि अंडा निषेचित होगा या नहीं — बिना निषेचित अंडों से नर पैदा होते हैं, जबकि निषेचित अंडों से रानी या श्रमिक, यह इस बात पर निर्भर करता है कि लार्वा को किस तरह खिलाया गया।

अंडे से वयस्क बनने में रानी को लगभग 16 दिन और नर को लगभग 24 दिन लगते हैं। श्रमिक मक्खियां लार्वा को खिलाने, छत्ता बनाने और युवा मक्खियों की रक्षा करने का पूरा जिम्मा उठाती हैं।

स्वस्थ कॉलोनियां नई रानी कोशिकाएं तैयार कर झुंड के रूप में प्रजनन करती हैं — पुरानी रानी आधी श्रमिकों के साथ छत्ता छोड़ देती है, जबकि पीछे बची नई रानियां आपस में लड़कर तय करती हैं कि अंततः कौन कॉलोनी की उत्तराधिकारी बनेगी।

आबादी और पारिस्थितिक भूमिका

Apis mellifera को पारिस्थितिकी तंत्र में कीस्टोन प्रजाति माना जाता है, क्योंकि यह अनेक जंगली पौधों की मुख्य परागणकर्ता है और इसके बिना इन पौधों की प्रजनन क्षमता काफी घट जाती है। उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में, जहां बड़ी कॉलोनियां बनाने वाली कोई देशी मधुमक्खी प्रजाति नहीं है, इसका असर जंगली फूलों और अकेले रहने वाली देशी मधुमक्खियों जैसी अन्य परागणकर्ताओं पर विशेष रूप से गहरा पड़ता है।

1990 के दशक की शुरुआत में वैरोआ माइट के प्रकोप ने उत्तरी अमेरिका और यूरोप की आबादी को गंभीर रूप से घटा दिया, और 2006-2007 में अमेरिका में सामने आई 'कॉलोनी कोलैप्स डिसऑर्डर' ने वाणिज्यिक मधुमक्खी पालकों को और नुकसान पहुंचाया — इसमें छत्तों से अचानक अधिकांश श्रमिक गायब हो जाते हैं, और बचे हुए इतने कम होते हैं कि वे रानी व लार्वा की देखभाल नहीं कर पाते। जंगली, बिना देखभाल वाली कॉलोनियां भी इस दौर में बड़े पैमाने पर समाप्त हो गईं, हालांकि हल्की जलवायु वाले क्षेत्रों में वैरोआ-प्रतिरोधी नस्लों के प्राकृतिक चयन से वे धीरे-धीरे फिर से बस रही हैं।

इस प्रजाति को वैरोआ माइट, श्वासनली माइट, अमेरिकन व यूरोपियन फाउलब्रूड जैसी जीवाणु बीमारियां, चॉकब्रूड फफूंद और नोसेमा जैसे परजीवियों से लगातार खतरा बना रहता है। इसके अलावा हॉर्नेट, मकड़ियां, बी-ईटर और समर टैनेजर जैसे पक्षी, तथा हनी बैजर जैसे स्तनधारी भी इसके प्राकृतिक शिकारियों में शामिल हैं।

पालतूकरण और मानव इतिहास

मिस्र में लगभग 5,000 साल पहले के प्रमाण बताते हैं कि मनुष्य कृत्रिम छत्तों में मधुमक्खी पालन कर रहे थे, हालांकि पालतूकरण से पहले यह प्रजाति स्वाभाविक रूप से खोखले पेड़ों में घोंसला बनाती थी। मूल रूप से अफ्रीका या एशिया से उत्पन्न होकर यह पहले अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप में स्वाभाविक रूप से फैली, और फिर 1600 के दशक की शुरुआत में मनुष्यों ने यूरोपीय उप-प्रजातियों को उत्तरी अमेरिका ले जाकर इसका दायरा दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और पूर्वी एशिया तक बढ़ा दिया।

आज मधुमक्खी पालन एक बड़ा वैश्विक उद्योग है। साल 2005 में इस प्रजाति की परागण सेवाओं का अनुमानित व्यावसायिक मूल्य करीब 200 अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया था। अमेरिका में कैलिफोर्निया के बादाम के बागानों में फरवरी-मार्च में होने वाला परागण दुनिया का सबसे बड़ा प्रबंधित परागण आयोजन है, जिसके लिए देश की एक-तिहाई से अधिक प्रबंधित मधुमक्खी कॉलोनियां वहां पहुंचाई जाती हैं; इसी तरह सेब और ब्लूबेरी जैसी फसलों के लिए भी मधुमक्खी पालक अपनी कॉलोनियां मौसम के अनुसार अलग-अलग राज्यों में ले जाते हैं।

छत्तों से शहद और मोम के अलावा पराग, प्रोपोलिस और रॉयल जेली भी निकाली जाती है, जिनका इस्तेमाल दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में होता है। इसके डंक के विष पर हो रहे शोध से संकेत मिलते हैं कि यह ऑटो-इम्यून बीमारियों और सूजन के इलाज में उपयोगी हो सकता है। साथ ही, तंत्रिका तंत्र और व्यवहार के बीच संबंध समझने के लिए भी यह प्रजाति एक प्रमुख अध्ययन विषय बनी हुई है।

संरक्षण और खतरे

IUCN की रेड लिस्ट में Apis mellifera को 'डेटा-अपर्याप्त' श्रेणी में रखा गया है — यानी इसकी वैश्विक आबादी की सुरक्षा-स्थिति तय करने लायक पर्याप्त वैज्ञानिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं, भले ही समग्र रूप से यह प्रजाति अब भी बहुत बड़ी संख्या में मौजूद है।

सबसे बड़ा खतरा Varroa destructor माइट से है, जो लार्वा और वयस्क मक्खियों दोनों को नुकसान पहुंचाता है और साथ में कई वायरस भी फैलाता है — इसके संक्रमण से पूरी कॉलोनियां खत्म हो सकती हैं। इसके अलावा श्वासनली माइट, कॉलोनी कोलैप्स डिसऑर्डर, अमेरिकन व यूरोपियन फाउलब्रूड जैसी बीमारियां, और यूरोप में व्यावसायिक मधुमक्खी पालन के बढ़ते व्यावसायीकरण से स्थानीय रूप से अनुकूलित उप-प्रजातियों के लुप्त होने की चिंता भी जताई गई है। कीटनाशकों, विशेषकर नियोनिकोटिनॉइड, का प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है — कुछ अध्ययनों में खेत की सामान्य मात्रा में कोई असर नहीं मिला, जबकि 2020 के एक अध्ययन में इनसे मक्खियों के विकास में गड़बड़ी और नर मक्खियों के अधिक संवेदनशील होने के प्रमाण मिले।

गैर-देशी क्षेत्रों में जंगली रूप से बसी यह मक्खी कभी-कभी देशी मधुमक्खियों और भौंरों के साथ भोजन व आवास के लिए प्रतिस्पर्धा करती है, हालांकि इससे देशी आबादी में सीधी गिरावट के प्रमाण अभी सीमित हैं।

संरक्षण स्थिति

  1. DD

आंकड़ा-अपर्याप्त

सांस्कृतिक महत्व

प्राचीन मिस्र में मधुमक्खी को जीवन, पुनर्जन्म और पुनरुत्थान का प्रतीक माना जाता था, जो इसके परागण और शहद-निर्माण से जुड़े गुणों से प्रेरित था। ग्रीक और रोमन परंपराओं में इसे उर्वरता और अधोलोक से जोड़ा गया, जबकि हिंदू पौराणिक कथाओं में मधुमक्खियों को प्रकृति में संतुलन बनाए रखने वाला दैवीय सहायक माना गया है।

शहद और मोम का उपयोग मोमबत्ती बनाने और जलरोधी करने जैसे कामों में सदियों से होता आया है। भारत में आधुनिक मधुमक्खी पालन और यूरोपीय मधु मक्खी Apis mellifera का परिचय 19वीं सदी के अंत में हुआ।

रोचक तथ्य

  1. उप-प्रजाति Apis mellifera cypria आक्रमणकारी हॉर्नेट को दम घोंटकर मार सकती है, भले ही वह घातक तापमान तक न पहुंच पाए।
  2. डंक मारने पर निकलने वाला अलार्म फेरोमोन दुर्भाग्य से 'छोटे हाइव बीटल' को भी आकर्षित करता है, जिससे रक्षक मक्खियों के लिए दुविधा पैदा होती है।
  3. 'मधुमक्खी जूं' कहलाने वाला Braula coeca असल में जूं नहीं बल्कि एक पंखहीन मक्खी है, जो मक्खियों के बीच भोजन के आदान-प्रदान के दौरान चोरी-छिपे खाना खा लेती है।
  4. समर टैनेजर पक्षी छत्ते के प्रवेश द्वार पर बैठकर एक बार में दर्जनों मधुमक्खियां पकड़ सकता है।
  5. साल 2000 में कॉर्नेल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अकेले अमेरिकी खाद्य फसलों पर इस मक्खी के परागण के मूल्य का अनुमान लगभग 14.6 अरब डॉलर लगाया था।

पारिस्थितिकी

आवास

  • वनभूमि
  • घास का मैदान
  • शहरी
  • सवाना

व्यवहार

  • क्षेत्रीय
  • आक्रामक
  • सामाजिक
  • दिवाचर

आहार

  • मकरंदाहारी

फ़ोटो

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फूल पर बैठी एक वयस्क पश्चिमी मधु मक्खी, जिसका शरीर सुनहरे-भूरे और काले धारीदार बालों से ढका है, पारदर्शी पंख हैं और पिछली टांगों पर पराग की गठरी दिखाई दे रही है।फ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipediaEncyclopedia of LifeAnimal Diversity WebAnAge