नर Cardinalis cardinalis का चमकदार सिंदूरी-लाल रंग किसी वंशानुगत रंजक से नहीं, बल्कि आहार में मौजूद पीले और लाल कैरोटिनॉइड यौगिकों के रासायनिक रूपांतरण से बनता है — यदि पक्षी को केवल पीले रंजक ही खिलाए जाएँ, तो उसका रंग फीका गुलाबी रह जाता है।
यह पासरीन गीत-पक्षी Cardinalidae परिवार का सदस्य है और दक्षिण-पूर्वी कनाडा से लेकर पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, बेलीज़ तथा ग्वाटेमाला तक फैले जंगलों, बगीचों, झाड़ीदार भूमि और आर्द्रभूमि में पाया जाता है; इसे बरमूडा और हवाई द्वीपों में भी सफलतापूर्वक बसाया गया है। IUCN रेड लिस्ट में इसे संकट-मुक्त (Least Concern) श्रेणी में रखा गया है।
यह पक्षी अमेरिका के सात राज्यों — इलिनॉय, इंडियाना, केंटकी, नॉर्थ कैरोलिना, ओहायो, वर्जीनिया और वेस्ट वर्जीनिया — का राजकीय पक्षी है, जो किसी भी अन्य प्रजाति से अधिक है, और घर के बगीचों में इसकी नियमित उपस्थिति इसे उत्तरी अमेरिका के सबसे पहचाने जाने वाले पक्षियों में शामिल करती है।
पहचान और रूप
Cardinalis cardinalis की पहचान की सबसे आसान कड़ी नर का पूरी तरह चमकीला लाल शरीर, सिर पर उठी हुई नुकीली शिखा और आँखों से होते हुए ऊपरी छाती तक फैला काला मास्क है, साथ ही एक मजबूत, शंकु-आकार की चमकीली नारंगी-लाल चोंच।
शरीर की लंबाई 21 से 23.5 सेंटीमीटर और पंखों का फैलाव 25 से 31 सेंटीमीटर तक होता है; वयस्क का वज़न 33.6 से 65 ग्राम के बीच रहता है, जिसका औसत लगभग 44.8 ग्राम है। नर औसतन मादा से थोड़ा बड़ा होता है, हालाँकि रंग में अंतर आकार के अंतर से कहीं अधिक स्पष्ट है।
मादा का रंग धूसर-भूरे रंग का होता है, जिसमें पंखों, शिखा और पूँछ पर हल्की लाल आभा दिखती है; उसका मास्क धूसर से काले रंग का पर नर की तुलना में कम स्पष्ट होता है। दोनों लिंगों में उठी हुई शिखा और चमकीली मूँगिया चोंच समान रूप से मौजूद रहती है। किशोर पक्षी, नर और मादा दोनों, शरद ऋतु में पंख बदलने तक मादा जैसे ही दिखते हैं — ऊपर से भूरे और नीचे से ईंट-जैसे लाल-भूरे, शिखा, माथे, पंख और पूँछ पर भी ईंट का रंग; पैर और पंजे गहरे गुलाबी-भूरे तथा आँख की पुतली भूरी होती है।
बहुत कम संख्या में पाए जाने वाले 'पीले रूप' के पक्षियों में लाल रंजक बनाने वाला एंज़ाइम नहीं होता, इसलिए उनकी चोंच और पंख पीले दिखते हैं जबकि आँखों का काला मास्क सामान्य ही रहता है — यह विशेषता जंगल में इस प्रजाति को पहचानने का एक असामान्य लेकिन निर्णायक संकेत है।
वितरण और आवास
Cardinalis cardinalis का प्राकृतिक विस्तार दक्षिण-पूर्वी कनाडा — दक्षिणी ओंटारियो, क्यूबेक, न्यू ब्रंज़विक और नोवा स्कोशिया से केप ब्रेटन द्वीप तक — से शुरू होकर पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका में मेन से मिनेसोटा और टेक्सास-मेक्सिको सीमा तक, तथा न्यू मेक्सिको, दक्षिणी एरिज़ोना व दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया तक फैला है। यह सीमा दक्षिण में मेक्सिको से होते हुए इस्थमस ऑफ़ तेहुआनतेपेक, उत्तरी ग्वाटेमाला और उत्तरी बेलीज़ तक जाती है, जबकि मेक्सिको के पश्चिमी तट पर जलिस्को से ओआहाका तक एक अलग-थलग आबादी पाई जाती है।
इसे 1700 में बरमूडा में और 1929 में हवाई के सभी प्रमुख द्वीपों में सफलतापूर्वक बसाया गया, जहाँ यह अब स्थायी रूप से पाया जाता है।
यह प्रजाति जंगलों के किनारों, हेजरो, घरों के आस-पास की झाड़ीदार भूमि, बगीचों, सवाना-घासभूमि, पहाड़ी क्षेत्रों, नदी-तटीय पट्टियों तथा उपनगरीय और कृषि क्षेत्रों में रहना पसंद करता है, जबकि घने और विस्तृत जंगल के भीतरी हिस्सों से दूर रहता है। घोंसले के लिए यह घनी झाड़ियों को प्राथमिकता देता है। पिछले लगभग 200 वर्षों में मानव-निर्मित आवासों और पिछवाड़े के बर्ड फीडरों में वृद्धि के कारण इसकी संख्या और भौगोलिक फैलाव दोनों में बढ़ोतरी हुई है — उदाहरण के लिए, मैसाचुसेट्स में 1929 में इसे दुर्लभ बताया गया था, 1955 तक यह उत्तर की ओर बढ़ता देखा गया, और 1960 के बाद से इसकी संख्या तेज़ी से बढ़ी।
GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़े अप्रैल-मई में सबसे अधिक (लगभग 37 से 42 लाख अभिलेख) और सर्दियों के महीनों में सबसे कम (करीब 15 से 18 लाख) दर्ज होते हैं; क्योंकि यह प्रजाति प्रवासी नहीं है और वर्षभर एक ही क्षेत्र में रहती है, यह उतार-चढ़ाव संभवतः वास्तविक आबादी में बदलाव के बजाय वसंत में पक्षी-दर्शन की बढ़ी हुई सक्रियता को दर्शाता है — ये आँकड़े केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, आबादी या पूर्ण वितरण क्षेत्र का प्रमाण नहीं।

व्यवहार और जीवनशैली
Cardinalis cardinalis प्रवासी नहीं है और वर्षभर अपने क्षेत्र में ही रहता है। यह दिन में सक्रिय रहता है, विशेष रूप से सुबह और शाम के समय। प्रजनन काल में यह अत्यंत क्षेत्ररक्षी हो जाता है — उत्तरी केंटकी में किए गए एक अध्ययन में सर्दियों के गृह-क्षेत्र (होम रेंज) का औसत आकार लगभग 0.212 वर्ग किलोमीटर मापा गया। सर्दियों में अधिकांश पक्षी झुंड बनाकर साथ रहते और साथ ही बसेरा करते हैं।
नर ऊँचे पेड़ या किसी ऊँचे स्थान से तेज़, स्पष्ट सीटी में गाकर अपना क्षेत्र घोषित करता है और घुसपैठिए नर पक्षियों को भगा देता है; कई बार वह किसी चमकदार सतह — जैसे शीशे या खिड़की — में अपना ही प्रतिबिंब देखकर उसे प्रतिद्वंद्वी समझकर लगातार हमला करता रहता है। यह प्रजाति अपने गीत सीखती है, इसलिए गीतों में क्षेत्रीय भिन्नता पाई जाती है, और पड़ोसी पक्षियों के गीतों में दूर के पक्षियों की तुलना में अधिक स्वर-अंश साझा होते हैं।
सर्दियों में ठंड से बचने के लिए यह अपने नीचे के मुलायम पंख फुलाकर शरीर के पास गर्म हवा रोक लेता है; पतले और बिना पंखों वाले पैर व पंजे तेज़ी से गर्मी खो सकते हैं, इसलिए पक्षी काँपकर और विशेष रूप से छाती की मांसपेशियों को तान कर गर्मी उत्पन्न करता है। ज़रूरत पड़ने पर यह अपने शरीर का तापमान 1.7 से 3.3 डिग्री सेल्सियस तक गिरा सकता है, जिससे कठोर सर्दी में ऊर्जा बचती है।
जोड़े अक्सर साथ-साथ विचरण करते हैं, और यह वृक्षवासी जीवनशैली अपनाकर अधिकांश समय पेड़ों और झाड़ियों में बिताता है, ज़मीन पर स्थिर रहने के बजाय उड़कर भोजन और सुरक्षित स्थान की खोज करता है।
संचार
Cardinalis cardinalis के नर और मादा दोनों गाते हैं — इसका गीत तेज़, स्पष्ट और सीटी जैसा होता है, जिसे बार-बार दोहराया और फिर बदला जाता है। इसे 'whoit whoit whoit', 'whacheer whacheer', 'cheeeer-a-dote, cheeer-a-dote-dote-dote', 'purdy purdy purdy... whoit whoit whoit whoit' और 'what-cheer what-cheer... wheet wheet wheet wheet' जैसी ध्वनियों में वर्णित किया गया है। यह गीत क्षेत्र की रक्षा करने और साथी को आकर्षित करने के लिए गाया जाता है।
संपर्क और चेतावनी के लिए यह एक छोटी, धात्विक 'चिप' ध्वनि निकालता है, जो विशेष रूप से तब सुनाई देती है जब कोई शिकारी घोंसले के पास आता है, ताकि मादा और चूजों को सतर्क किया जा सके। इसके साथ ही यह पूँछ को झटके से हिलाकर और शिखा को उठाकर-गिराकर भी दृश्य संकेतों से खतरे की सूचना देता है।
दिलचस्प बात यह है कि नर और मादा के गीत हार्मोन के स्तर में अंतर के कारण संरचनात्मक रूप से भिन्न होते हैं, हालाँकि मानव कान से इन्हें अलग पहचानना कठिन है। घोंसले में चूजे भोजन के लिए माता-पिता को आकर्षित करने हेतु आवाज़ निकालते हैं; बहुत छोटे चूजे घोंसला हिलाए जाने पर भी आवाज़ करते हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वे केवल माता-पिता की उपस्थिति या उनके गीत सुनकर ही प्रतिक्रिया देना शुरू करते हैं।
आहार और पोषण
Cardinalis cardinalis के आहार का लगभग 90 प्रतिशत भाग जंगली घासों के बीज, अनाज, कीड़े, फल और सूरजमुखी के बीज से बना होता है; यह उन बीजों को प्राथमिकता देता है जिनका छिलका आसानी से निकाला जा सके।
सर्दियों में जब भोजन की उपलब्धता घट जाती है, तो यह कम चयनात्मक हो जाता है और जो भी उपलब्ध हो उसे खा लेता है — एक बार कड़ाके की ठंड और बर्फीले दिन में इसे एक मृत ब्लैक-कैप्ड चिकाडी का मांस खाते देखा गया, जो इसके अवसरवादी स्वभाव को दर्शाता है।
चूजों का आहार वयस्कों से बिल्कुल अलग होता है — माता-पिता उन्हें लगभग पूरी तरह कीड़े ही खिलाते हैं, क्योंकि तेज़ी से बढ़ते शरीर को बीजों की तुलना में कीड़ों से मिलने वाला प्रोटीन कहीं अधिक उपयोगी होता है।
घोंसला और प्रजनन
Cardinalis cardinalis में जोड़ी सामान्यतः एक ही प्रजनन काल तक एकनिष्ठ रहती है, हालाँकि कभी-कभी एक नर एक से अधिक मादाओं से जुड़ जाता है। एकनिष्ठता के बावजूद अतिरिक्त-युगल संगम सामान्य है — एक अध्ययन में पाया गया कि 9 से 35 प्रतिशत चूजे सामाजिक साथी की संतान नहीं थे। वसंत की शुरुआत में नर विभिन्न प्रदर्शनों से मादा को आकर्षित करता है, जिसमें उसे चोंच-से-चोंच भोजन खिलाना भी शामिल है; जोड़े वर्षभर साथ रह सकते हैं और कई प्रजनन-काल तक एक साथ बने रहते हैं, हालाँकि कुछ जोड़े 'अलग' हो जाते हैं या साथी की मृत्यु पर नया साथी चुन लेते हैं।
मादा घनी झाड़ी, बेल के उलझाव या छोटे पेड़ में, ज़मीन से 1 से 3 मीटर ऊँचाई पर, एक अच्छी तरह छिपा हुआ कटोरा-आकार का घोंसला बनाती है; नर कभी-कभी सामग्री लाता है, पर अधिकांश निर्माण मादा ही करती है। घोंसला चार परतों से बना होता है — मोटी टहनियाँ (कभी-कभी कूड़े के टुकड़े भी) जिन पर पत्तियों की चादर बिछती है, फिर अंगूर की बेल की छाल और अंत में घास, तने, जड़ें व चीड़ की पत्तियाँ; इसे बनाने में तीन से नौ दिन लगते हैं और तैयार घोंसला लगभग 5.1 से 7.6 सेंटीमीटर ऊँचा और 10.1 सेंटीमीटर चौड़ा होता है। यह घोंसला सामान्यतः दोबारा उपयोग में नहीं लिया जाता।
मादा प्रति क्लच 1 से 5 (सामान्यतः 3 से 4) अंडे देती है, जो सफ़ेद से हल्के हरे रंग के होते हैं और बड़े सिरे की ओर घने लैवेंडर, धूसर या भूरे धब्बों से ढके रहते हैं; इनका आकार लगभग 26 x 19 मिलीमीटर होता है। मादा ही अंडों को 11 से 13 दिनों तक सेती है, जबकि नर उसे भोजन लाकर देता रहता है। प्रजनन काल मार्च से सितंबर तक चलता है और आम तौर पर वर्ष में दो बच्चे-समूह (ब्रूड) पाले जाते हैं — पहला मार्च के आस-पास और दूसरा मई के अंत से जुलाई के बीच; दूसरे घोंसले पर अक्सर ब्राउन-हेडेड काउबर्ड द्वारा परजीविता होती है।
अंडों से निकलने वाले चूजे अंधे, बिना पंख और पूरी तरह असहाय होते हैं, जिनका जन्म-वज़न केवल 3 से 3.5 ग्राम होता है और पंख 4 से 5 दिन की उम्र तक नहीं आते। दोनों माता-पिता उन्हें कीड़े खिलाते हैं, जिससे वे प्रतिदिन लगभग 2 से 3 ग्राम वज़न बढ़ाते हैं; माता-पिता मल-थैली भी घोंसले से हटाते हैं, जिन्हें पहले चार-पाँच दिन तक वे खा भी लेते हैं। चूजे अंडे से निकलने के 7 से 13 (औसतन 9 से 10) दिन बाद घोंसला छोड़ देते हैं, पर माता-पिता उन्हें अगले 25 से 56 दिनों तक भोजन देते रहते हैं। इसके बाद युवा पक्षी अन्य किशोरों के झुंड में शामिल हो जाते हैं और सामान्यतः अगले वसंत में स्वयं प्रजनन आरंभ करते हैं।
आबादी और पारिस्थितिक भूमिका
दुनिया भर में Cardinalis cardinalis की अनुमानित आबादी लगभग 10 करोड़ (100 मिलियन) व्यक्तियों की है, और पिछले लगभग 200 वर्षों में इसकी संख्या और भौगोलिक फैलाव दोनों में वृद्धि हुई है — मुख्यतः मानव-निर्मित उपनगरीय बगीचों, कृषि क्षेत्रों और पिछवाड़े के बर्ड फीडरों के विस्तार के कारण।
पारिस्थितिकी तंत्र में यह बीज और फल खाकर कई पौधों के बीजों को फैलाने में मदद करता है, जिससे स्थानीय वनस्पति की संरचना पर असर पड़ सकता है, और बॉल वीविल, कटवर्म व कैटरपिलर जैसे हानिकारक कीड़ों की संख्या नियंत्रित करने में सहायक होता है। यह बदले में बाज़ (एक्सिपिटर प्रजातियाँ), फाल्कन, गंजा और सुनहरा ईगल तथा लॉन्ग-ईयर्ड और ईस्टर्न स्क्रीच उल्लू जैसे शिकारियों के लिए भोजन बनता है, जबकि इसके अंडे और चूजे मिल्क सांप, रेसर सांप, ब्लू जे, कौवे, गिलहरियों, चिपमंक और घरेलू बिल्लियों का शिकार बनते हैं।
यह ब्राउन-हेडेड काउबर्ड के चूजों को अनजाने में पालकर स्थानीय काउबर्ड आबादी को भी सहारा देता है, और साथ ही कई आंतरिक व बाह्य परजीवियों का पोषक भी बना रहता है।
संरक्षण और खतरे
IUCN रेड लिस्ट में Cardinalis cardinalis को संकट-मुक्त (Least Concern) श्रेणी में रखा गया है, जो इसकी विस्तृत भौगोलिक सीमा और स्थिर या बढ़ती हुई आबादी को दर्शाता है; उपलब्ध जानकारी में इसके लिए किसी बड़े गंभीर खतरे का उल्लेख नहीं है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में यह 1918 के प्रवासी पक्षी संधि अधिनियम (Migratory Bird Treaty Act) के अंतर्गत संरक्षित है, जिसके तहत इसे पकड़ना, मारना या अपने पास रखना अवैध है — उल्लंघन पर 15,000 अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना और छह महीने तक की कैद हो सकती है। कनाडा में यह प्रवासी पक्षियों की रक्षा से संबंधित संधि के अंतर्गत संरक्षित है; CITES या अमेरिकी संघीय सूची में इसे कोई विशेष दर्जा नहीं दिया गया है।
पिछले दो शतकों में उपनगरीय विस्तार और घरों में बर्ड फीडर लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने इसकी आबादी और वितरण-क्षेत्र दोनों को बढ़ाया है। पहले इसे चमकीले रंग और मधुर गीत के कारण पालतू पक्षी के रूप में भी रखा जाता था, लेकिन प्रवासी पक्षी अधिनियम के बाद इसे पिंजरे के पक्षी के रूप में बेचना प्रतिबंधित कर दिया गया।
संरक्षण स्थिति
- LC
- NT
- VU
- EN
- CR
संकटमुक्त
सांस्कृतिक महत्व
चेरोकी लोककथाओं में Cardinalis cardinalis का घर के पास गाना निकट भविष्य में मेहमानों के आने का संकेत माना जाता है, जबकि इसका घर के भीतर आ जाना कभी-कभी मृत्यु का संकेत समझा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि यह पक्षी मृतकों की आत्माएँ लेकर चलता है। एक अन्य चेरोकी कथा इसे सूर्य की संतान बताती है और मानती है कि यह मौसम का पूर्वाभास दे सकता है; इसे सूर्य से जोड़कर सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है।
हिंदू परंपरा में इसे योग से जुड़े मूलाधार चक्र से जोड़ा जाता है। 'कार्डिनल' शब्द स्वयं लैटिन शब्द 'कार्डिनलिस' से आया है, जो रोमन चर्च के लाल वस्त्र पहनने वाले प्रधान पादरियों को संबोधित करने के लिए प्रयुक्त होता था। कई मूल अमेरिकी परंपराओं में इसे आत्मिक जगत का दूत माना जाता है, जो भटकी हुई आत्माओं का मार्गदर्शन करता है और शोक में डूबे लोगों को सांत्वना देता है।
मानव जीवन में इसका व्यावहारिक महत्व भी है — यह बॉल वीविल, कटवर्म और कैटरपिलर जैसे हानिकारक कीड़ों को खाकर फसलों की रक्षा करता है, और पिछवाड़े के बर्ड फीडरों का एक लोकप्रिय आगंतुक है। यह अमेरिका के सात राज्यों — इलिनॉय, इंडियाना, केंटकी, नॉर्थ कैरोलिना, ओहायो, वर्जीनिया और वेस्ट वर्जीनिया — का राजकीय पक्षी है, जो किसी भी अन्य प्रजाति से अधिक है; यह मेजर लीग बेसबॉल की सेंट लुइस कार्डिनल्स और नेशनल फुटबॉल लीग की एरिज़ोना कार्डिनल्स समेत कई कॉलेज टीमों का शुभंकर भी है, और शिकागो-वाशिंगटन के बीच चलने वाली एमट्रैक की 'कार्डिनल' रेलगाड़ी का नाम भी इसी पक्षी पर रखा गया है।
रोचक तथ्य
- जंगल में बैंड लगे एक Cardinalis cardinalis की उम्र कम से कम 15 वर्ष और 9 महीने दर्ज की गई है, जबकि कैद में पाले गए एक पक्षी ने 28.5 वर्ष तक जीवन जिया; वयस्कों की वार्षिक जीवित रहने की दर लगभग 60 से 65 प्रतिशत आँकी गई है।
- नर पक्षी अक्सर शीशे या खिड़की में अपने प्रतिबिंब को प्रतिद्वंद्वी समझकर उस पर लगातार हमला करता रहता है।
- अटलांटा, जॉर्जिया में 2016 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, Cardinalis cardinalis संक्रमण के बाद वेस्ट नाइल वायरस को जैविक रूप से दबाने में सक्षम पाया गया, जो अन्य कई प्रजातियों में नहीं देखा गया।
- शिकागो और वाशिंगटन डी.सी. के बीच चलने वाली एमट्रैक की 'कार्डिनल' ट्रेन का नाम इस पक्षी पर रखा गया है, क्योंकि इसके मार्ग पर पड़ने वाले सभी राज्यों में यह राजकीय पक्षी है।
- यह डेलावेयर के राजकीय पक्षी पद के लिए भी दावेदार था, लेकिन यह पद डेलावेयर ब्लू हेन को मिला।
- इसकी अनुमानित वैश्विक वितरण-सीमा लगभग 58 लाख वर्ग किलोमीटर आँकी गई है।
पारिस्थितिकी
आवास
- आर्द्रभूमि
- वनभूमि
- झाड़ीदार भूमि
- घास का मैदान
व्यवहार
- क्षेत्रीय
- सामाजिक
- दिवाचर
- वृक्षवासी
आहार
- सर्वाहारी
फ़ोटो
स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipediaEncyclopedia of LifeAnimal Diversity WebAnAge



