गैलापागोस कछुआ (Chelonoidis niger) दुनिया का सबसे बड़ा जीवित कछुआ है, जिसका वजन 417 किलोग्राम तक पहुंच सकता है। यह पृथ्वी पर सबसे बड़ा जीवित स्थलीय शीतरक्त (ऐक्टोथर्मिक) प्राणी भी है।
यह टेस्टुडाइनेस गण और टेस्टुडिनिडे कुल का सदस्य है, तथा जीनस Chelonoidis के अंतर्गत आता है। इस प्रजाति में 15 उपजातियाँ शामिल हैं, जो सभी गैलापागोस द्वीपसमूह की मूल निवासी हैं। इसकी संरक्षण स्थिति IUCN द्वारा 'विलुप्त' के रूप में वर्गीकृत की गई है, हालांकि यह वर्गीकरण उपजातियों के बीच भिन्न-भिन्न वास्तविक स्थिति को दर्शाता है।
यह कछुआ न केवल आकार में असाधारण है, बल्कि द्वीपीय विकास, दीर्घायु और मानव इतिहास के साथ इसके जटिल संबंधों के कारण भी सदियों से यात्रियों और वैज्ञानिकों का ध्यान खींचता रहा है।
पहचान और रूप
गैलापागोस कछुए की सबसे स्पष्ट पहचान इसके खोल (कैरापेस) का आकार है, जो या तो 'सैडलबैक' (काठी जैसा, आगे की ओर उठा हुआ) या 'डोम्ड' (गुंबद जैसा, गोल) हो सकता है। यह अंतर उस द्वीप के प्रकार पर निर्भर करता है जहाँ संबंधित उपजाति रहती है।
आकार में यह अत्यंत विशाल है। सबसे बड़े दर्ज किए गए व्यक्ति 400 किलोग्राम से अधिक वजन और 1.87 मीटर लंबाई तक पहुंचे हैं। बड़ी उपजातियों में परिपक्व नर 272 से 317 किलोग्राम तक और मादाएं 136 से 181 किलोग्राम तक वजन की होती हैं, जबकि पिंज़ोन द्वीप की उपजाति में अधिकतम वजन केवल 76 किलोग्राम और खोल की लंबाई लगभग 61 सेंटीमीटर होती है, जो सांता क्रूज़ की उपजाति (75 से 150 सेंटीमीटर) से काफी छोटी है।
खोल का रंग धूसर या भूरा होता है, और इस पर लाइकेन उग सकते हैं। खोल की प्लेटें पसलियों के साथ जुड़ी होती हैं और जीवन भर एक स्थिर स्कूट पैटर्न बनाए रखती हैं, हालांकि समय के साथ बाहरी परतें घिस जाने से वृद्धि के छल्लों से उम्र का अनुमान लगाना संभव नहीं होता। अगले पैरों में पाँच पंजे और पिछले पैरों में चार पंजे होते हैं।
डोम्ड कछुए बड़े, नम पहाड़ी क्षेत्रों (800 मीटर से अधिक ऊँचाई, जैसे सांता क्रूज़) से आते हैं, जहाँ भोजन प्रचुर होता है, और इनकी गर्दन तथा पैर तुलनात्मक रूप से छोटे होते हैं। इसके विपरीत, सैडलबैक कछुए शुष्क, सीमित संसाधनों वाले छोटे द्वीपों (500 मीटर से कम ऊँचाई, जैसे एस्पानोला और पिंज़ोन) से आते हैं और इनकी गर्दन लंबी होती है, जिससे सिर सिकोड़ने पर खोल में एक बड़ा असुरक्षित अंतराल रह जाता है।
वितरण और आवास
यह प्रजाति गैलापागोस द्वीपसमूह की मूल निवासी है और विभिन्न द्वीपों पर अलग-अलग उपजातियों के रूप में फैली हुई है। बड़े, नम उच्चभूमि वाले द्वीप, जैसे सांता क्रूज़, सघन वनस्पति वाले वातावरण प्रदान करते हैं, जबकि छोटे, शुष्क द्वीप जैसे एस्पानोला और पिंज़ोन में संसाधन काफी सीमित रहते हैं।
उपलब्ध मासिक अवलोकन आंकड़ों में मई, जून और जुलाई के महीनों में सबसे अधिक गणनाएँ दर्ज की गई हैं, जो संभवतः इस अवधि में अधिक मौसमी उपस्थिति की ओर संकेत करती हैं, जबकि सितंबर के आसपास संख्या सबसे कम रहती है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये आंकड़े केवल अवलोकन में उपस्थिति दर्शाते हैं, न कि कछुओं की वास्तविक बहुतायत, जनसंख्या आकार या संपूर्ण मूल वितरण क्षेत्र।

व्यवहार और जीवनशैली
गैलापागोस कछुआ शीतरक्त प्राणी है, इसलिए यह भोर के बाद 1 से 2 घंटे तक अपने गहरे खोल के माध्यम से सूर्य की गर्मी सोखने के लिए धूप में बैठता है, इसके बाद प्रतिदिन 8 से 9 घंटे तक भोजन की खोज में सक्रिय रहता है। यह मुख्यतः सुबह जल्दी या दोपहर बाद विश्राम और चारागाह क्षेत्रों के बीच चलता है, जिसकी गति लगभग 0.3 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
बड़े और अधिक नम द्वीपों पर कछुए मौसमी रूप से प्रवास करते हैं—बारिश के मौसम में निचले घास के मैदानों की ओर और शुष्क मौसम में 610 मीटर तक की ऊँचाई वाले घास के मैदानों की ओर। पीढ़ियों से एक ही मार्गों के उपयोग से घनी वनस्पति में स्पष्ट पथ बन गए हैं, जिन्हें 'कछुआ राजमार्ग' कहा जाता है। नम द्वीपों पर डोम्ड कछुए समूहों में रहना पसंद करते हैं, जबकि सैडलबैक कछुए अधिकतर एकांतप्रिय और क्षेत्रीय स्वभाव के होते हैं।
ठंडी रातों में तापमान नियंत्रण और मच्छरों व चिचड़ियों जैसे परजीवियों से बचाव के लिए कछुए कीचड़ के गड्ढों या वर्षा से बने तालाबों में विश्राम करते हैं, और मिट्टी में धूल स्नान करते हैं। कुछ कछुए चट्टानों के नीचे शरण लेते हैं, जबकि अन्य ज़मीन में बने छोटे गड्ढों, जिन्हें 'पैलेट' कहा जाता है, में सोते हैं।
कछुओं का गैलापागोस के कुछ फिंच और मॉकिंगबर्ड पक्षियों के साथ परस्पर लाभकारी संबंध है—पक्षी कछुए के शरीर से परेशान करने वाले बाह्य परजीवियों को हटाते हैं और इस दौरान भोजन प्राप्त करते हैं। कछुआ गर्दन और पैर फैलाकर संकेत देता है कि वह तैयार है। रुचिकर बात यह है कि कुछ कछुए इस व्यवहार का दुरुपयोग करते हैं—पक्षी के अपने नीचे आने पर वे अचानक अपने अंगों को सिकोड़कर सीधे ज़मीन पर गिर जाते हैं, जिससे पक्षी कुचल जाता है, और फिर कछुआ उसे प्रोटीन के स्रोत के रूप में खा लेता है।
आहार और पोषण
गैलापागोस कछुआ पूर्णतः शाकाहारी है और इसके आहार में कैक्टस, घास, विभिन्न शाकीय पौधे, पत्तियाँ, लाइकेन, बेरी, खरबूजे, संतरे, मिल्कवीड और बिछुआ शामिल हैं। इन्हें Hippomane mancinella (विष सेब), स्थानीय अमरूद Psidium galapageium, जल फर्न Azolla microphylla, ब्रोमेलियाड Tillandsia insularis और गैलापागोस टमाटर Solanum cheesmaniae खाते हुए भी देखा गया है।
किशोर कछुए प्रतिदिन अपने शरीर के वजन का औसतन 16.7% शुष्क पदार्थ के रूप में ग्रहण करते हैं, और इनकी पाचन क्षमता घोड़ों तथा गैंडों जैसे हिंडगट-किण्वन करने वाले शाकाहारी स्तनधारियों के लगभग बराबर होती है।
अधिकांश पानी इन्हें ओस और पौधों, विशेष रूप से Opuntia कैक्टस के रस से मिलता है, जिससे वे बिना पानी पिए छह महीने से अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं। भोजन और पानी दोनों की अनुपस्थिति में ये अपने शरीर की चर्बी को तोड़कर पानी उत्पन्न करते हुए एक वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जो इनकी अत्यंत धीमी उपापचय दर के कारण संभव होता है।
जब पानी उपलब्ध होता है, तो कछुए बड़ी मात्रा में तेज़ी से पीते हैं और इसे मूत्राशय तथा गर्दन की जड़ (पेरिकार्डियम) में संग्रहित करते हैं। शुष्क द्वीपों पर, कछुए सुबह की ओस को चट्टानों से चाटते हैं, और पीढ़ियों से दोहराई गई इस क्रिया ने चट्टानों में अर्धगोलाकार गड्ढे बना दिए हैं।
घोंसला और प्रजनन
गैलापागोस कछुओं में संभोग वर्ष के किसी भी समय हो सकता है, हालांकि नम उच्चभूमियों में बारिश के मौसम के दौरान फरवरी से जून के बीच इसकी चरम अवधि होती है। परिपक्व नर आपस में मिलने पर औपचारिक प्रभुत्व प्रदर्शन करते हैं—वे अपने पैरों पर खड़े होकर गर्दन फैलाते और मुँह खोलते हैं। कभी-कभी सिर काटने की घटनाएँ भी होती हैं, लेकिन सामान्यतः छोटा कछुआ पीछे हट जाता है। यह व्यवहार सैडलबैक उपजातियों में सबसे अधिक स्पष्ट होता है, जो अधिक आक्रामक होती हैं और जिनकी गर्दन लंबी होती है।
संभोग से पहले नर मादा के खोल से टकराता है और उसके पैरों को काटता है, जो काफी आक्रामक हो सकता है। नर का खोल नीचे से अवतल होता है, जो मादा के ऊपर संतुलन बनाने में मदद करता है। संभोग के दौरान नर भारी, कर्कश स्वर में 'लयबद्ध कराहने' जैसी आवाज़ें निकालता है, जो इस प्रजाति की दुर्लभ ध्वनियों में से एक है।
मादाएं जुलाई से नवंबर के बीच घोंसला बनाने के लिए शुष्क, रेतीले तटीय क्षेत्रों तक कई किलोमीटर की यात्रा करती हैं। घोंसला खोदना एक थकावट भरा काम है, जिसमें मादा केवल अपने पिछले पैरों का उपयोग करके अंधाधुंध तरीके से लगभग 30 सेंटीमीटर गहरा बेलनाकार गड्ढा कई दिनों तक, प्रतिदिन कई घंटे, खोदती है। इसमें वह 16 तक गोलाकार, कठोर छिलके वाले अंडे देती है, जिनका वजन 82 से 157 ग्राम तक होता है। डोम्ड उपजातियों (जैसे सांता क्रूज़ की C. porteri, औसतन 9.6 अंडे प्रति समूह) में सैडलबैक उपजातियों (जैसे पिंज़ोन की C. duncanensis, औसतन 4.6 अंडे प्रति समूह) की तुलना में अधिक अंडे होते हैं। मादा मिट्टी और मूत्र से बना कीचड़ का ढक्कन बनाकर घोंसले को बंद करती है, फिर उसे अपने प्लास्ट्रॉन से दबाकर सील कर देती है, और अंडों को सूर्य की गर्मी से सेने के लिए छोड़ देती है। एक मौसम में मादा एक से चार बार अंडे दे सकती है। घोंसले का तापमान संतानों के लिंग को निर्धारित करता है—कम तापमान पर अधिक नर और उच्च तापमान पर अधिक मादा हैचलिंग उत्पन्न होते हैं।
1959 में गैलापागोस राष्ट्रीय उद्यान और चार्ल्स डार्विन फाउंडेशन की स्थापना के बाद संरक्षण कार्यक्रम शुरू हुए। पिंज़ोन द्वीप पर, जहाँ प्रवेशित चूहों द्वारा सभी हैचलिंग नष्ट किए जाने के कारण जनसंख्या 200 से कम वृद्ध वयस्कों तक सिमट गई थी, 1965 से प्रजनन और पालन कार्यक्रम शुरू किए गए। अंडे संरक्षित स्थलों से एकत्र किए जाते हैं, और हैचलिंग को चार से पाँच वर्षों तक बंदी अवस्था में पाला जाता है ताकि वे प्राकृतिक आवास में जीवित रहने योग्य आकार प्राप्त कर सकें, इसके बाद उन्हें उनके मूल द्वीपों पर छोड़ा जाता है। एस्पानोला उपजाति की सबसे उल्लेखनीय बहाली हुई, जहाँ केवल 3 नर और 12 मादाओं से शुरू करके, 1971 से चार्ल्स डार्विन शोध केंद्र में 33 वर्षों के प्रजनन कार्यक्रम ने 1,200 से अधिक संतानें उत्पन्न कीं, जिनमें से एक नर, डिएगो, ने अनुमानतः 350 से 800 संतानों को जन्म दिया।
संरक्षण और खतरे
IUCN द्वारा इस प्रजाति की समग्र स्थिति 'विलुप्त' के रूप में सूचीबद्ध की गई है, हालांकि यह वर्गीकरण उपजातियों के बीच भिन्न-भिन्न वास्तविकता को दर्शाता है। मूल उपजाति C. n. niger मानवीय शोषण के कारण 19वीं शताब्दी में विलुप्त हो गई, और C. n. abingdonii 24 जून 2012 को अंतिम जीवित सदस्य, नर 'लोनसम जॉर्ज', की मृत्यु के साथ विलुप्त घोषित की गई—जिसे विश्व का 'सबसे दुर्लभ जीवित प्राणी' कहा जाता था। बाकी सभी जीवित उपजातियाँ IUCN द्वारा कम से कम 'सुभेद्य' या इससे भी गंभीर स्थिति में सूचीबद्ध हैं।
सबसे बड़ा खतरा ऐतिहासिक मानव शोषण रहा है। 16वीं शताब्दी में खोज के समय लगभग 2,50,000 कछुए थे, लेकिन 20वीं शताब्दी से पहले अनुमानतः 2,00,000 कछुओं को नाविकों द्वारा जहाजों पर ताज़े मांस और पानी के स्रोत के रूप में ले जाया गया, क्योंकि वे भोजन-पानी के बिना महीनों तक जीवित रह सकते थे। इसके परिणामस्वरूप 1974 की गणना में जंगली जनसंख्या घटकर मात्र 3,060 व्यक्तियों तक पहुंच गई।
आधुनिक संरक्षण प्रयासों, जिनमें 1959 में स्थापित गैलापागोस राष्ट्रीय उद्यान और चार्ल्स डार्विन फाउंडेशन की भूमिका महत्वपूर्ण रही, ने जनसंख्या को 1995–2009 के अनुमान के अनुसार 19,317 तक पहुँचाने में मदद की। 1965 से चल रहे प्रजनन और पुनर्वास कार्यक्रमों ने आठ में से सात संकटग्रस्त उपजातियों को कम खतरनाक स्तर तक पहुंचाया है।
एक बड़ा शेष खतरा प्रवेशित प्रजातियों से आता है, जैसे चूहे, जिन्होंने पिंज़ोन द्वीप पर दशकों तक सभी हैचलिंगों को नष्ट कर दिया था—यह उपजाति केवल कछुओं की असाधारण दीर्घायु के बल पर विलुप्ति से बची रही।
संरक्षण स्थिति
- EX
विलुप्त
रोचक तथ्य
- 18वीं और 19वीं शताब्दी में नाविक इन्हें 'जीवित पीपे' (living casks) कहते थे, क्योंकि इन्हें महीनों तक जहाजों के डेक पर मांस और पानी के जीवित भंडार के रूप में रखा जाता था।
- अंग्रेज़ खोजकर्ता विलियम डैम्पियर ने लिखा था कि इनका मांस इतना स्वादिष्ट होता है कि 'कोई मुर्गी इससे बेहतर स्वाद नहीं देती', जबकि कैप्टन डेविड पोर्टर ने इसे पचाने में सबसे आसान मांस बताया था।
- 1875 में प्राणीविज्ञानी अल्बर्ट गुंथर ने गैलापागोस से कम से कम पाँच अलग-अलग जनसंख्याओं की पहचान की थी, और बाद में जॉन वैन डेनबर्घ ने 15 उपजातियों के अस्तित्व का प्रस्ताव रखा, जो आज भी वर्गीकरण का आधार है।
- 2021 से पहले के आनुवंशिक अध्ययनों ने सुझाव दिया कि गैलापागोस और हिंद महासागर के कछुओं के बीच आनुवंशिक भिन्नता को अतिरंजित आंका गया था, जिससे सभी गैलापागोस कछुओं को एक ही प्रजाति, C. niger, की उपजातियों के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने का समर्थन मिला।
पारिस्थितिकी
आवास
- तटीय
- पर्वत
- घास का मैदान
- मरुस्थल
व्यवहार
- क्षेत्रीय
- सामाजिक
- दिवाचर
- प्रवासी
आहार
- शाकाहारी


