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अर्गट

Claviceps purpurea

राई की बाल पर उगे काले, सींगनुमा अर्गट स्क्लेरोशियम जो सामान्य दानों के बीच झांकते हुए दिखाई देते हैंफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

एक नज़र में

इसके लिए जाना जाता है
आर्द्रभूमिघास का मैदान
वर्गीकरण
संघ
Ascomycota
वर्ग
Sordariomycetes
गण
Hypocreales
कुल
Clavicipitaceae
वंश
Claviceps
प्रजाति
Claviceps purpurea

Claviceps purpurea, जिसे सामान्यतः अर्गट कहा जाता है, एक ऐसा कवक है जो राई (Secale cereale) और उससे संबंधित अनाजों तथा चारा घासों की बालियों पर पलता है। यदि इस कवक से संक्रमित दानों या बीजों का सेवन किया जाए, तो मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में एर्गोटिज़्म नामक विषाक्तता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

यह कवक Clavicipitaceae परिवार का सदस्य है और Ascomycota संघ के अंतर्गत आता है। यह मुख्यतः उन अनाजों को प्रभावित करता है जिनमें बाहरी परागण होता है, जैसे राई, ट्रिटिकेल, गेहूं और जौ, जबकि जौ से मिलती-जुलती फसल जई में इसका संक्रमण दुर्लभ ही देखा जाता है।

यह कवक इतिहास और मानव संस्कृति दोनों में गहराई से जुड़ा रहा है — फसलों की पैदावार को प्रभावित करने वाला एक कृषि-शत्रु होने के साथ-साथ यह प्राचीन काल में रहस्यमय अनुभवों और आधुनिक औषधि विज्ञान से भी जोड़ा जाता रहा है।

फलन काय और पहचान

अर्गट की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी स्क्लेरोशियम नामक कठोर, बीज जैसी संरचना है, जो संक्रमित अनाज की बाली में सामान्य दाने के स्थान पर विकसित होती है। संक्रमण की शुरुआत में यह एक सफेद, मुलायम ऊतक — जिसे Sphacelia segetum कहा जाता है — के रूप में दिखाई देती है, जो मीठा, चिपचिपा स्राव (हनीड्यू) उत्पन्न करता है। इस स्राव में लाखों अलैंगिक कोनिडिया होते हैं, जो कीटों या वर्षा के माध्यम से अन्य बालियों तक फैलते हैं।

समय के साथ यह मुलायम ऊतक एक सूखी, कठोर और गहरे रंग की संरचना में बदल जाता है, जो अनाज की भूसी के भीतर छिपी रहती है। इस स्क्लेरोशियम में एल्केलॉइड और वसा (जैसे रिसिनोलेइक अम्ल) जैसे रसायन जमा होते हैं, जो इसकी विषाक्तता के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं।

जब परिपक्व स्क्लेरोशियम भूमि पर गिरता है, तो उपयुक्त परिस्थितियां मिलने पर यह अंकुरित होकर एक या कई छोटे, छत्रक जैसे फलनकाय बनाता है, जिनमें एक सिर और एक डंडी होती है। इनका रंग विभिन्न हो सकता है, और सिर के भीतर बने पेरिथीशिया में लैंगिक बीजाणु (एस्कोस्पोर) तैयार होते हैं।

वितरण और आवास

अर्गट कई प्रकार की घासों और अनाजों पर पाया जाता है, जिनमें Agrostis canina, Alopecurus pratensis, Bromus की कई प्रजातियां, Elymus repens, Festuca arundinacea, Poa pratensis, Phleum pratense और Phalaris arundinacea शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यह Danthonia, Molinia caerulea जैसी घासों और नमक-भूमि की घासों जैसे Spartina तथा Distichlis पर भी उगता है।

GBIF पर दर्ज मासिक उपस्थिति आंकड़ों से पता चलता है कि इस कवक की देखे जाने की संख्या गर्मी और शरद ऋतु के महीनों में सबसे अधिक रहती है — अगस्त में सबसे अधिक (लगभग 4,852 दर्ज उपस्थितियां) और सितंबर में उसके निकट (लगभग 4,774), जबकि जनवरी से अप्रैल के बीच संख्या काफी कम रहती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह आंकड़े केवल उपस्थिति दर्ज करने की घटनाएं हैं, न कि इसकी बहुतायत, जनसंख्या या पूर्ण वितरण क्षेत्र का सटीक माप।

यह पैटर्न इस बात से मेल खाता है कि अर्गट का फलनकाय आमतौर पर अनाज और घासों के पुष्पन काल के आसपास दिखाई देता है, जो गर्मी के बाद के महीनों में सर्वाधिक सक्रिय रहता है।

Claviceps purpurea के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
4,852
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

जीवन चक्र

अर्गट का जीवन चक्र तब शुरू होता है जब घास या अनाज के फूल का एक अंश Claviceps purpurea के एस्कोस्पोर से संक्रमित हो जाता है। यह संक्रमण उसी तरह होता है जैसे परागकण अंडाशय में प्रवेश करता है, इसीलिए यह मुख्यतः उन प्रजातियों को प्रभावित करता है जो बाहरी परागण करती हैं और जिनके फूल खुले रहते हैं, जैसे राई और Alopecurus।

संक्रमण के बाद कवक का जालतंतु (मायसीलियम) पौधे के अंडाशय को नष्ट कर देता है और उसकी नलिका तंत्र से जुड़ जाता है, जो पहले विकसित होते बीज को पोषण देने के लिए बना था। पहले चरण में यह मुलायम, सफेद ऊतक — Sphacelia segetum — के रूप में दिखाई देता है, जो शर्करा युक्त स्राव छोड़ता है जिसमें लाखों अलैंगिक कोनिडिया होते हैं। यह स्राव कीटों या वर्षा के माध्यम से अन्य फूलों तक पहुंचकर संक्रमण को फैलाता है। धीरे-धीरे यह ऊतक कठोर, सूखे स्क्लेरोशियम में बदल जाता है, जिसमें एल्केलॉइड और वसा जमा होते हैं।

जब यह परिपक्व स्क्लेरोशियम भूमि पर गिर जाता है, तो यह उपयुक्त परिस्थितियां — जैसे वसंत का आगमन या वर्षा — मिलने तक निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसके बाद यह अंकुरित होकर छत्रक जैसे फलनकाय बनाता है, जिनसे लैंगिक बीजाणु उस समय छोड़े जाते हैं जब उपयुक्त मेज़बान घास फूल रही होती है। Polistes dorsalis नामक सामाजिक बर्रों की एक प्रजाति को इस कवक के प्रसार का वाहक पाया गया है, क्योंकि चारा खोजते समय कोनिडिया कणों उनके शरीर से चिपक जाते हैं; मक्खियों और शलभों में भी कोनिडिया ले जाने की क्षमता देखी गई है, हालांकि पौधों के बीच संक्रमण फैलाने में कीटों की वास्तविक भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है।

उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास

मानव इतिहास में अर्गट का जुड़ाव औषधि विज्ञान और प्राचीन संस्कृति दोनों से रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राचीन यूनान की उन्मादक धार्मिक रीतियों में अर्गट से जुड़े पदार्थों का उपयोग हुआ हो सकता था, क्योंकि इस कवक से संक्रमित अनाज में LSA नामक रसायन बनता है, जो LSD के लिए एक पूर्ववर्ती रासायनिक यौगिक है।

अर्गट का उल्लेख चिकित्सा और विज्ञान से संबंधित संग्रहालय-प्रदर्शनों में भी मिलता है, जो इसके औषधीय महत्व और मानव चिकित्सा इतिहास में इसकी भूमिका को दर्शाता है।

रोचक तथ्य

  1. अर्गट की एक उप-प्रजाति, जिसे Claviceps purpurea var. spartinae (समूह G3) कहा जाता है, समुद्री दलदली घासों जैसे Spartina और Distichlis पर विशेष रूप से उगती है।
  2. स्क्लेरोशियम के आकार और आकृति को कवक की विभिन्न किस्मों को पहचानने का भरोसेमंद तरीका नहीं माना जाता, क्योंकि यह काफी हद तक मेज़बान फूल के आकार पर निर्भर करता है; कोनिडिया के आकार में भी परासरणी दबाव के कारण महत्वपूर्ण भिन्नता आ जाती है।
  3. जब से मनुष्यों ने गेहूं, राई, जौ और जई जैसे अनाज उगाना शुरू किया है, तब से वे अर्गट विषाक्तता के प्रति संवेदनशील रहे हैं।

पारिस्थितिकी

आवास

  • आर्द्रभूमि
  • घास का मैदान

फ़ोटो

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राई की बाल पर उगे काले, सींगनुमा अर्गट स्क्लेरोशियम जो सामान्य दानों के बीच झांकते हुए दिखाई देते हैंफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipedia