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Dermochelys coriacea

Dermochelys coriacea

कोई दर्ज सामान्य नाम नहीं

VUसुभेद्य
गहरे भूरे-काले रंग का विशाल समुद्री कछुआ जिसकी पीठ पर सफेद-गुलाबी धब्बे हैं, हड्डीदार कवच के बिना चमड़े जैसी पीठ पर सात उभरी धारियाँ दिखती हैं, और बड़े अगले फ्लिपर पंख फैलाए हुए यह गहरे समुद्र में तैर रहा है।फ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

माप

वज़न
420–420 kg
जीवनकाल
≤ 30 वर्ष
वर्गीकरण
संघ
Chordata
वर्ग
Testudines
कुल
Dermochelyidae
वंश
Dermochelys
प्रजाति
Dermochelys coriacea

लेदरबैक समुद्री कछुआ सभी जीवित कछुओं में सबसे बड़ा है और मगरमच्छ-वंश के सरीसृपों को छोड़कर धरती पर पाया जाने वाला सबसे भारी सरीसृप है; यह 2.7 मीटर तक लंबा और 500 किलोग्राम तक वजनी हो सकता है।

यह Dermochelys वंश और Dermochelyidae कुल की एकमात्र जीवित प्रजाति है, और अन्य समुद्री कछुओं से इसे पहचानना आसान है क्योंकि इसकी पीठ हड्डी के कवच से नहीं बनी, बल्कि तेलयुक्त मांस और लचीली, चमड़े जैसी त्वचा से ढकी होती है, जिससे इसका नाम पड़ा। यह विश्व के लगभग सभी उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण और यहाँ तक कि कुछ उपध्रुवीय महासागरों में पाया जाता है, और IUCN इसे समग्र रूप से "असुरक्षित" (Vulnerable) श्रेणी में रखता है, हालांकि इसकी कुछ उप-जनसंख्याएं गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

ठंडे पानी में जीवित रहने की इसकी शारीरिक क्षमताएं, प्राचीन वंश-रेखा और महासागरों को पार करने वाले प्रवास इसे कछुओं की दुनिया में एक असाधारण उदाहरण बनाते हैं।

पहचान और रूप

इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसकी पीठ पर हड्डी का कवच नहीं होता; इसके बजाय मोटी, चमड़े जैसी त्वचा छोटे-छोटे अस्थि-कणों (ऑस्टियोडर्म) को ढके रहती है, और इस चमड़े जैसी पीठ पर सिर से पूंछ तक सात उभरी हुई धारियाँ दौड़ती हैं।

वयस्क कछुओं की वक्रित कवच लंबाई (CCL) औसतन 1 से 1.75 मीटर और कुल लंबाई 1.83 से 2.2 मीटर होती है, जबकि वजन 250 से 700 किलोग्राम तक हो सकता है; कैरिबियन क्षेत्र में औसत वजन लगभग 384 किलोग्राम और फ्रेंच गुयाना में लगभग 339 किलोग्राम दर्ज किया गया है। सबसे बड़ा प्रमाणित नमूना पाकिस्तान के सैंडस्पिट समुद्र तट पर मिला था, जिसकी लंबाई 213 सेंटीमीटर और वजन 650 किलोग्राम था। इसके विपरीत, नवजात शिशु कछुए बेहद छोटे होते हैं—मात्र 61.3 मिलीमीटर लंबे और लगभग 46 ग्राम वजनी।

शरीर बूंद के आकार का और अत्यधिक जलधारा-अनुकूल है; इसके अगले फ्लिपर पंख बिना पंजों के होते हैं और बड़े नमूनों में सिरे से सिरे तक 2.7 मीटर तक फैल सकते हैं, जो किसी भी समुद्री कछुए के अनुपात में सबसे बड़े फ्लिपर हैं। शरीर का ऊपरी भाग गहरे धूसर से काले रंग का होता है जिस पर सफेद-गुलाबी धब्बे बिखरे रहते हैं, जबकि निचला भाग हल्के रंग का होता है। इसके दांत नहीं होते, बल्कि ऊपरी होंठ पर नुकीले कोर और गले में पीछे की ओर मुड़ी हुई कांटेदार संरचनाएं होती हैं जो शिकार को पकड़े रखने में मदद करती हैं।

यह अन्य सभी आधुनिक समुद्री कछुओं से अलग है क्योंकि इसमें शल्क (स्कूट) पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं—यह विशेषता केवल सॉफ्ट-शेल कछुओं और पिग-नोज़्ड कछुए में देखी जाती है, हालांकि उनमें यह त्वचीय श्वसन के लिए काम करती है, जबकि लेदरबैक में इसका उद्देश्य शरीर की चर्बी को समायोजित करना माना जाता है। इसके शल्कों में β-केराटिन नहीं होता, जो सरीसृपों में अनोखा है, और ठंडे पानी में जीवित रहने के लिए इसमें भूरी चर्बी, तापमान-स्वतंत्र तैराकी मांसपेशियां और फ्लिपर से शरीर के भीतरी भाग तक ऊष्मा संरक्षित करने वाली प्रणालियां विकसित हुई हैं।

वितरण और आवास

सभी जीवित समुद्री कछुओं में इसका वितरण सबसे व्यापक है—यह उत्तर में अलास्का और नॉर्वे तक और दक्षिण में अफ्रीका के केप एगुलहास तथा न्यूज़ीलैंड के सबसे दक्षिणी सिरे तक पाया जाता है। यह लगभग सभी उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय और यहाँ तक कि उपध्रुवीय महासागरों में मौजूद है।

इसकी तीन आनुवंशिक रूप से भिन्न प्रमुख जनसंख्याएं अटलांटिक, पूर्वी प्रशांत और पश्चिमी प्रशांत महासागरों में पाई जाती हैं, जबकि हिंद महासागर की जनसंख्याओं का अब तक विस्तृत आकलन नहीं हुआ है।

यह मुख्यतः खुले समुद्र में पेलैजिक जीवन बिताता है, लेकिन भोजन खोजते समय तटीय जल में भी आता है; इसे 1230 मीटर तक की गहराई पर, प्रकाश क्षेत्र से कहीं नीचे, देखा गया है। यह भूमि पर केवल घोंसला बनाने के लिए आता है, और यह भी केवल मादाएं करती हैं—वे गहरे समुद्र की ओर खुले, बिना कोरल रीफ की सुरक्षा वाले तटों को प्राथमिकता देती हैं।

GBIF के मासिक अवलोकन आंकड़ों में जुलाई के आसपास सबसे अधिक दर्ज (लगभग 6,842) उपस्थितियां दिखती हैं, जो सतर्कतापूर्वक मौसमी सक्रियता के संकेत हो सकती हैं, हालांकि ये आंकड़े केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, आबादी का आकार नहीं। इंडोनेशिया के तांब्राऊ क्षेत्र से एक कछुए को 647 दिनों में लगभग 20,000 किलोमीटर की यात्रा करते हुए अमेरिका तक ट्रैक किया गया था, जो इसकी विशाल प्रवास क्षमता को दर्शाता है।

Dermochelys coriacea के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
6,842
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

व्यवहार और जीवनशैली

यह मुख्यतः एकांतप्रिय और प्रवासी जीव है, जो घोंसला बनाने वाले तटों और भोजन क्षेत्रों के बीच लंबी दूरी तय करता है।

यह जेलीफ़िश की सघन उपस्थिति वाले क्षेत्रों की खोज करता है और सतह के पास भोजन करता है या शिकार की सबसे घनी सांद्रता तक पहुंचने के लिए गहराई में गोता लगाता है, जिसमें यह 1,000 मीटर तक की गहराई तक जा सकता है।

शिकार और आहार

यह अपने शिकार—मुख्यतः जेलीफ़िश—का पीछा दिन के समय ऊर्ध्वाधर दिशा में करता है: दिन में यह गहरे पानी में उतर जाता है और रात में सतह के पास आ जाता है, क्योंकि जेलीफ़िश स्वयं इसी लय में जल स्तंभ में ऊपर-नीचे होती हैं। यह शिकार रणनीति इसे अत्यंत ठंडे जल में ले जाती है—एक कछुआ 0.4 डिग्री सेल्सियस तक ठंडे पानी में सक्रिय रूप से शिकार करता पाया गया, जिसके बाद वह शरीर को गर्म करने के लिए लगभग 17.5 डिग्री सेल्सियस की सतही जलधाराओं में लौट आया। यह 1,000 मीटर से अधिक गहराई तक शिकार का पीछा करता है, जो बीक्ड और स्पर्म व्हेल के अलावा किसी भी अन्य गोताखोर स्थलीय-वंशज प्राणी की शारीरिक सीमा से आगे है।

इसका मुख्य आहार जेलीफ़िश और सैल्प जैसे कोमल-शरीर वाले अकशेरुकी जीव हैं, हालांकि यह छोटे क्रस्टेशियन, मछलियां (संभवतः जेलीफ़िश के साथ सहजीवी रूप में), सेफेलोपॉड, समुद्री अर्चिन और घोंघे भी खाता है।

अन्य समुद्री कछुओं की तरह इसमें कठोर कवच वाले शिकार को कुचलने वाली शक्तिशाली जबड़ा-मांसपेशियां नहीं होतीं; इसके बजाय इसके जबड़े तेज़ किनारों वाले होते हैं जो कोमल शिकार को काटने के लिए उपयुक्त हैं। इसकी ग्रासनली में पीछे की ओर मुड़ी हुई कांटेदार संरचनाएं होती हैं, जो निगले गए जेलीफ़िश को दोबारा बाहर निकलने से रोकती हैं।

घोंसला और प्रजनन

संभोग समुद्र में होता है—नर मादाओं के पसंदीदा घोंसला-तट के पास प्रजनन काल शुरू होने से पहले ही एकत्र हो जाते हैं और अधिकतम मादाओं के साथ संभोग का प्रयास करते हैं। माना जाता है कि मादा संभवतः फेरोमोन के माध्यम से अपनी प्रजनन-तैयारी का संकेत देती है, और नर सिर हिलाने, नाक रगड़ने, काटने या फ्लिपर की हरकतों से मादा की ग्रहणशीलता जांचते हैं; अक्सर एक ही मादा के साथ कई नर संभोग करते हैं। नर कभी भूमि पर नहीं आते और घोंसला बनाने की प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।

मादा रात के समय तट पर आती है और फ्लिपरों से घोंसला खोदती है; वह अंधेरे जंगल की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति दिखाती है क्योंकि उसकी आंखें भूमि पर रात्रि-दृष्टि के लिए अनुकूलित नहीं हैं, और चांदनी में चमकते समुद्र तथा अंधेरे जंगल के बीच का विरोधाभास उसे दिशा देता है। घोंसला बनाने से लेकर लौटने तक की पूरी प्रक्रिया में औसतन 108 मिनट लगते हैं। एक बार में औसतन लगभग 110 अंडे दिए जाते हैं, जिनमें से लगभग 85 प्रतिशत ही विकासशील (जीवनक्षम) होते हैं—बाकी बिना जीवद्रव्य के होते हैं।

मादा एक ही प्रजनन काल में पांच से सात बार घोंसला बना सकती है, हर बार लगभग नौ से दस दिनों के अंतराल पर, और सामान्यतः हर दो से तीन साल में उस क्षेत्र में लौटती है, हालांकि वह अपने जन्मस्थान के अलावा उसी क्षेत्र के दूसरे तट को भी चुन सकती है। प्रजनन काल सामान्यतः अप्रैल से नवंबर के बीच होता है, और अंडों का इनक्यूबेशन काल लगभग 55 से 75 दिनों का होता है।

अंडे देने और उन्हें रेत से ढकने के बाद मादा की भूमिका समाप्त हो जाती है—इसके बाद बच्चों की कोई अभिभावकीय देखभाल नहीं होती, और नवजात कछुए तुरंत स्वतंत्र होकर स्वयं समुद्र की ओर बढ़ते हैं। मादाएं पांच से 21 वर्ष की आयु में यौन परिपक्वता प्राप्त करती हैं।

आबादी और पारिस्थितिक भूमिका

1980 में अनुमानित लगभग 1,15,000 घोंसला बनाने वाली मादाओं की तुलना में अब वैश्विक स्तर पर केवल 26,000 से 43,000 मादाएं ही वार्षिक रूप से घोंसला बनाती हैं—यह एक बड़ी गिरावट है।

पारिस्थितिकी तंत्र में यह जेलीफ़िश और अन्य कोमल-शरीर वाले समुद्री जीवों का प्रमुख शिकारी है, जिसका शिकार-जनसंख्या पर पड़ने वाला प्रभाव पूरी तरह ज्ञात नहीं है, हालांकि जनसंख्या में गिरावट से पहले यह प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण रहा होगा। घोंसला-तटों के पास इसके अंडे और नवजात शिशु कई तटीय शिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण भोजन स्रोत हैं। यह Conchoderma virgatum नामक बार्नेकल प्रजाति के लिए सहभोजी (कॉमेंसल) मेज़बान का भी काम करता है, और तट पर मृत पाए गए शवों पर मक्खियों तथा कई भृंग परिवारों की प्रजातियां आकर अस्थायी सूक्ष्म-पारिस्थितिकी तंत्र बना लेती हैं।

जीवन के आरंभिक चरणों में अंडे और शिशु केकड़ों, मॉनिटर छिपकलियों, रैकून, कुत्तों, गीदड़ों और कई तटीय पक्षियों के शिकार बनते हैं, जबकि समुद्र में प्रवेश करने के बाद युवा कछुए बड़ी मछलियों और सेफेलोपॉड का शिकार बनते हैं। वयस्क होने पर शिकारियों की संख्या घट जाती है, हालांकि किलर व्हेल, ग्रेट व्हाइट शार्क और टाइगर शार्क कभी-कभार वयस्कों पर भी हमला करती हैं, और घोंसला बनाने वाली मादाओं पर जगुआर तथा खारे पानी के मगरमच्छ हमला करते देखे गए हैं।

संरक्षण और खतरे

IUCN इस प्रजाति को समग्र रूप से "असुरक्षित" (Vulnerable) श्रेणी में रखता है, जबकि प्रशांत महासागर जैसी कुछ क्षेत्रीय उप-जनसंख्याओं को "गंभीर रूप से संकटग्रस्त" माना गया है; संयुक्त राज्य अमेरिका इसे "संकटग्रस्त" (Endangered) सूचीबद्ध करता है, और यह CITES के परिशिष्ट-I में शामिल है, जिसके तहत इसका अंतरराष्ट्रीय व्यापार अवैध है।

सबसे गंभीर खतरा व्यावसायिक मछली पकड़ना है, जिसमें कछुए जालों, ट्रॉल और लॉन्गलाइन में फंसकर डूब जाते हैं या घायल हो जाते हैं। अंडों का मानव द्वारा संग्रहण भी एक बड़ी समस्या है, और साथ ही यह कछुआ समुद्र में तैरते प्लास्टिक कचरे को जेलीफ़िश समझकर निगल लेता है, जो पचता नहीं और आंतों में अवरोध पैदा कर मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्रशांत महासागर में घोंसला बनाने वाली मादाओं की संख्या में पिछले एक दशक में 70 से 80 प्रतिशत तक गिरावट आई है, और WWF के अनुसार अब केवल लगभग 2,300 वयस्क मादाएं ही बची हैं, जो इसे सबसे संकटग्रस्त समुद्री कछुआ उप-जनसंख्या बनाती है। मलेशिया के रंताउ आबंग तट पर, जो कभी विश्व की सबसे बड़ी घोंसला-स्थली थी, अंडों के अत्यधिक संग्रहण और गलत इनक्यूबेशन तकनीकों के कारण जनसंख्या प्रभावी रूप से समाप्त हो गई है।

घोंसला-तटों पर प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र स्थापित किए गए हैं, कुछ जगहों पर अंडों को कैद में इनक्यूबेट किया जाता है, और अमेरिका में 2004 में "मरीन टर्टल कंज़र्वेशन एक्ट" पारित हुआ था; टर्टल-एक्सक्लूज़न उपकरणों का उपयोग कुछ सरकारें अनिवार्य करती हैं, हालांकि यह व्यापक अभ्यास नहीं बन पाया है।

संरक्षण स्थिति

  1. LC
  2. NT
  3. VU
  4. EN
  5. CR

सुभेद्य

सांस्कृतिक महत्व

मेक्सिको के सोनोरा राज्य के सेरी समुदाय के लिए यह कछुआ गहरा सांस्कृतिक महत्व रखता है—वे इसे अपने पांच प्रमुख सृष्टिकर्ताओं में से एक मानते हैं और जब कोई कछुआ पकड़ा जाता है और फिर छोड़ा जाता है, तो उसके सम्मान में समारोह और उत्सव आयोजित करते हैं। इस समुदाय ने जनसंख्या में गिरावट को देखते हुए "ग्रुपो टॉर्तुगेरो कोमाक" नामक संरक्षण समूह बनाया है, जो परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक दोनों का उपयोग करता है।

मलेशिया के तेरेंगानु राज्य में यह राज्य का प्रतीक पशु है और पर्यटन विज्ञापनों में अक्सर दिखाया जाता है। न्यूज़ीलैंड के बैंक्स पेनिनसुला में यह कछुआ नगाई ताहू जनजाति के कोउकौरारता हापू और व्यापक माओरी तथा पॉलिनेशियाई परंपरा में आध्यात्मिक महत्व रखता है; 2021 में न्यूज़ीलैंड के संरक्षण विभाग ने हापू के रीति-रिवाजों के अनुसार एक कछुए को होरोमाका द्वीप की एक पहाड़ी गुफा में विधिवत दफनाया।

चीनी काव्य-परंपरा में कछुआ दीर्घायु, धीरज, भव्यता और प्राचीनता का प्रतीक माना जाता है। व्यावहारिक रूप से, कुछ क्षेत्रों में वयस्क कछुओं का मांस (जो कभी-कभी विषैला हो सकता है) और अंडे भोजन के रूप में उपयोग किए जाते हैं, और शरीर से निकाले गए तेल का उपयोग औषधीय प्रयोजन तथा जलरोधी सामग्री के रूप में होता है; इसके विपरीत, यह कछुआ तैराकों और मत्स्य-पालन के लिए परेशानी का कारण बनने वाली जेलीफ़िश को खाकर एक लाभकारी पारिस्थितिक भूमिका भी निभाता है।

रोचक तथ्य

  1. यह अपने वंश (genus) Dermochelys और कुल (family) Dermochelyidae की एकमात्र जीवित प्रजाति है।
  2. इसका नाम "लेदरबैक" इसकी तेलयुक्त, चमड़े जैसी पीठ से पड़ा है, जो अन्य कछुओं की हड्डीदार कवच से बिल्कुल अलग है।
  3. यह सभी जीवित कछुओं में सबसे बड़ी प्रजाति है, और मगरमच्छ-वंश को छोड़कर किसी भी सरीसृप से अधिक भारी हो सकता है।
  4. इसकी उप-जनसंख्याएं महाद्वीपों के आर-पार फैली हैं—कुछ गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं, जबकि समग्र प्रजाति को "असुरक्षित" श्रेणी में रखा गया है।

पारिस्थितिकी

आवास

  • समुद्री
  • तटीय

आहार

  • मांसाहारी

व्यवहार

  • परभक्षी
  • एकांतप्रिय
  • जलीय
  • प्रवासी

फ़ोटो

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गहरे भूरे-काले रंग का विशाल समुद्री कछुआ जिसकी पीठ पर सफेद-गुलाबी धब्बे हैं, हड्डीदार कवच के बिना चमड़े जैसी पीठ पर सात उभरी धारियाँ दिखती हैं, और बड़े अगले फ्लिपर पंख फैलाए हुए यह गहरे समुद्र में तैर रहा है।फ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipediaEncyclopedia of LifeAnimal Diversity WebAnAge