यह कवक शंकुधारी पेड़ों के आधार और जड़ों को भीतर से सड़ाता है। इसके फलन काय कभी-कभी 25 सेंटीमीटर से भी बड़े हो जाते हैं। Phaeolus schweinitzii एक कवक-रोगजनक है, जो भूरी सड़न (ब्राउन रॉट) पैदा करता है।
यह यूरेशिया का मूल निवासी है। न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में इसे विदेशी प्रजाति के रूप में पहचाना गया है। पेड़ों के भीतर चल रही यह सड़न बाहर से देर तक नहीं दिखती, इसलिए इसका प्रभाव वन प्रबंधन में विशेष महत्व रखता है।
फलन काय और पहचान
इसका फलन काय ज़मीन से जुड़ा दिखता है, क्योंकि यह अक्सर पेड़ की जड़ों या तने के आधार से उगता है। उगते समय इसमें घास के तिनके, टहनियाँ और गिरी हुई पाइन की सुइयाँ अक्सर समा जाती हैं।
युवा नमूनों के किनारे नारंगी से हल्के रंग के होते हैं, जबकि ऊपरी सतह भूरापन लिए होती है और बीच का हिस्सा गहरे भूरे रंग का होता है। फलन काय का व्यास 25 सेंटीमीटर से अधिक हो सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ छिद्र-सतह पीली से हरी-पीली हो जाती है और ऊपरी भाग गहरा होता है। पीला-भूरा गूदा सख्त और लकड़ी जैसा हो जाता है। छिद्र दबाने पर भूरे हो जाते हैं। बीजाणु सफेद, अंडाकार और चिकने होते हैं, और आयोडीन अभिकर्मक से नीले नहीं होते।
इससे मिलती-जुलती प्रजातियों में Heterobasidion irregulare, H. occidentale, Inonotus dryophilus और Onnia tomentosa शामिल हैं।
वितरण और आवास
यह मुख्य रूप से शंकुधारी पेड़ों पर पाया जाता है। इसके मेज़बान पेड़ों में डगलस-फ़र, स्प्रूस, फ़र, हेमलॉक, पाइन और लार्च शामिल हैं। यह इन पेड़ों के आधार में भूरी सड़न पैदा करता है।
यूरेशिया इसका मूल क्षेत्र है। न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में इसे विदेशी प्रजाति माना गया है, जहाँ यह बाहर से लाए गए शंकुधारी पेड़ों के साथ पहुँचा।
उपलब्ध वितरण-आँकड़ों में इसकी उपस्थिति सितंबर और अक्टूबर के आसपास सबसे अधिक दिखती है, जो फलन काय के बढ़ने के मौसम से मेल खाती है।

उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास
यह एक उत्कृष्ट प्राकृतिक रंजक स्रोत है। इसके सूखे फलन काय से हरा, पीला, सुनहरा या भूरा रंग निकाला जाता है। रंग का वास्तविक शेड इस पर निर्भर करता है कि किस सामग्री को रंगा जा रहा है और कौन सा रंगाई-बंधक पदार्थ इस्तेमाल हुआ है।
इसे खाने योग्य नहीं माना जाता, इसलिए इसका उपयोग मुख्य रूप से रंगाई तक सीमित रहा है।
वन-कर्मियों और लकड़हारों के बीच यह पेड़ों की स्थिरता के संकेतक के रूप में जाना जाता था। पारंपरिक काष्ठकार और लकड़हारे इसके लक्षणों पर नज़र रखते थे, ताकि पता चले कि कोई पेड़ कितना अस्थिर हो चुका है।
रोचक तथ्य
- इसके वैज्ञानिक नाम का पहला भाग प्राचीन यूनानी शब्द से आता है, जिसका अर्थ है 'गहरा' या 'अस्पष्ट'।
- प्रजाति-नाम schweinitzii पेन्सिल्वेनिया में जन्मे कवक-विज्ञानी लुईस डेविड वॉन श्वाइनिट्ज़ के सम्मान में रखा गया है।
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पारिस्थितिकी और वर्गीकरण
वर्गीकरण
- संघ
- Basidiomycota
- वर्ग
- Agaricomycetes
- गण
- Polyporales
- कुल
- Laetiporaceae
- वंश
- Phaeolus
- प्रजाति
- Phaeolus schweinitzii
स्रोत
- GBIF Species names and classification
- iNaturalist Photos
- Wikidata Common names and conservation status
- Wikipedia Summary extract



