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मूली

Raphanus sativus

मूली (Raphanus sativus) की पूरी पौध खाने योग्य होती है, न केवल इसकी प्रसिद्ध जड़। यह सरसों परिवार, ब्रैसिकेसी, से संबंधित एक फूल वाला पौधा है, जिसकी मांसल जड़ को दुनिया भर में सब्जी के रूप में उगाया और खाया जाता है, जबकि इसकी पत्तियों का उपयोग कभी-कभी पत्तेदार सब्जी के रूप में भी किया जाता है।

एशिया में पालतू बनाई गई यह प्रजाति आज लगभग पूरी दुनिया में उगाई जाती है। इसकी तेज़ वृद्धि दर, विविध रंग-रूप और खाने के कई तरीके इसे बगीचों और रसोई दोनों में लोकप्रिय बनाते हैं।

पहचान और रूप

मूली की पहचान का सबसे उपयोगी संकेत इसकी फूली हुई, मांसल जड़ है, जो गोलाकार, शंक्वाकार या बेलनाकार आकार की हो सकती है। जड़ की त्वचा का रंग सफेद से लेकर गुलाबी, लाल, बैंगनी, पीला, हरा और यहां तक कि काला भी हो सकता है, जबकि भीतरी गूदा आमतौर पर सफेद ही रहता है। लाल किस्मों में पेलारगोनिडिन नामक एंथोसायनिन रंगद्रव्य पाया जाता है, जबकि बैंगनी किस्मों का रंग सायनिडिन से आता है।

छोटे प्रकारों में लगभग 13 सेंटीमीटर लंबी कुछ पत्तियां और 2.5 सेंटीमीटर या उससे अधिक व्यास वाली गोल जड़ें होती हैं, या फिर पतली, लंबी जड़ें जो 7 सेंटीमीटर तक बढ़ती हैं। इनके विपरीत, पूर्वी किस्में जैसे डाइकोन या सर्दियों की मूली 60 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं, जिनकी पत्तियां भी लगभग उतनी ही ऊंचाई और 45 सेंटीमीटर तक फैलाव वाली होती हैं।

पत्तियां एक रोज़ेट के आकार में व्यवस्थित होती हैं और इनका आकार पंखनुमा (लायरेट) होता है, जिसमें एक बड़ा अंतिम पालि और छोटी-छोटी पार्श्व पालियां होती हैं। सफेद फूल एक रेसीमोज पुष्पक्रम पर लगते हैं, और इनसे बनने वाली छोटी फलियां युवा अवस्था में खाई जा सकती हैं। समय पर काटी गई मूली कुरकुरी और हल्की तीखी होती है, पर जमीन में अधिक देर रहने पर कड़वी और सख्त हो जाती है।

वितरण और आवास

मूली मूल रूप से यूरोप से भूमध्यसागरीय क्षेत्र और मध्य एशिया तक फैले क्षेत्र की मानी जाती है, जिसमें अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की और कई यूरोपीय देश शामिल हैं। यह समशीतोष्ण जलवायु में स्वाभाविक रूप से पाई जाती है।

खेती के माध्यम से यह अब लगभग हर महाद्वीप में फैल चुकी है, जिसमें उत्तर और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया के बड़े हिस्से और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं, जहां इसे व्यापक रूप से उगाया जाता है।

मासिक अवलोकन आंकड़ों में वसंत से लेकर गर्मियों की शुरुआत तक, विशेष रूप से अप्रैल से जुलाई के महीनों में, स्पष्ट वृद्धि दिखाई देती है, जो संभवतः इस अवधि में इसकी बुआई और वृद्धि के मौसम से मेल खाती है। यह आंकड़े केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, न कि जनसंख्या या पूर्ण प्राकृतिक विस्तार का पैमाना।

Raphanus sativus के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
5,449
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

वृद्धि और स्वरूप

मूली एक वार्षिक या द्विवार्षिक पौधा है, जो अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ता है। उपयुक्त परिस्थितियों में इसके बीज तीन से चार दिनों में अंकुरित हो जाते हैं, और सामान्य परिस्थितियों में फसल तीन से चार सप्ताह में तैयार हो जाती है, जबकि ठंडे मौसम में इसमें छह से सात सप्ताह तक का समय लग सकता है।

पारिस्थितिकी और संबंध

मूली के फूलों पर कई प्रकार की मधुमक्खियां और भौंरे आते हैं, जिनमें भौंरों की प्रजातियां सबसे अधिक दर्ज की गई हैं, हालांकि केवल फूल पर आना परागण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही कुछ छोटी मधुमक्खियां और रेत-मधुमक्खियां भी इसके फूलों पर आती देखी गई हैं।

पत्तियों को कई तितलियों की सूंडियां खाती हैं, जिनमें गोभी की सफेद तितलियां सबसे अधिक दर्ज की गई हैं, साथ ही कुछ एफिड प्रजातियां भी पौधे का रस चूसती हैं। कुछ भृंग और टिड्डे भी इसके पत्तों को अपना आहार बनाते हैं।

पौधे पर कुछ जीवाणु जनित संक्रमण भी दर्ज किए गए हैं, जिनमें Xanthomonas campestris सबसे अधिक बार रिपोर्ट किया गया है, साथ ही कुछ थ्रिप्स और अन्य सूक्ष्म कीट भी इससे जुड़े पाए गए हैं।

उपयोग और मानव संबंध

मूली की जड़ विश्व भर में सबसे अधिक खाया जाने वाला भाग है, हालांकि पूरा पौधा खाने योग्य होता है और इसकी पत्तियों को पत्तेदार सब्जी की तरह भी उपयोग किया जाता है। बीजों को अंकुरित करके भी कच्चा खाया जा सकता है, मूंग की तरह।

कच्ची मूली की बनावट कुरकुरी और स्वाद तीखा-मिर्चीला होता है, जो ग्लूकोसिनोलेट्स और माइरोसिनेज एंजाइम की प्रतिक्रिया से बनने वाले एलिल आइसोथायोसाइनेट्स के कारण होता है, यही यौगिक सरसों, हॉर्सरैडिश और वसाबी में भी पाए जाते हैं। इसे अधिकतर सलाद में प्रयोग किया जाता है, पर यूरोपीय व्यंजनों और मक्सिकन व्यंजनों, जैसे टोस्टाडा और पोज़ोले, में भी गार्निश के रूप में इसका उपयोग होता है।

बागवानी में मूली को साथी पौधे के रूप में भी उगाया जाता है, क्योंकि इसकी तीखी गंध एफिड, खीरे के भृंग और चींटियों जैसे कीटों को दूर रखने में मदद करती है। यह खीरे के साथ विशेष रूप से अच्छी तरह उगती है, जबकि हिसॉप के साथ इसका तालमेल खराब रहता है। 2003-2004 के आंकड़ों के अनुसार मूली का वार्षिक विश्व उत्पादन लगभग 7 million tonnes था, जिसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया मुख्य उत्पादक देश रहे।

रोचक तथ्य

  1. मूली का वैज्ञानिक नाम Raphanus sativus है और यह सरसों परिवार, ब्रैसिकेसी, का सदस्य है।
  2. मूली को कभी-कभी Raphanus raphanistrum की उपजाति के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है, जो इसके जंगली पूर्वज से इसके करीबी संबंध को दर्शाता है।

फ़ोटो

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पारिस्थितिकी और वर्गीकरण

वृद्धि का रूप

  • शाकीय पौधा

वर्गीकरण

संघ
Tracheophyta
वर्ग
Magnoliopsida
गण
Brassicales
कुल
Brassicaceae
वंश
Raphanus
प्रजाति
Raphanus sativus

स्रोत

  1. GBIF Species names and classification
  2. Wikidata Common names and conservation status
  3. Wikipedia Summary extract
  4. Plants of the World Online Native range, life form and climate (WCVP)
  5. Wikimedia Commons Photos
  6. GloBI What it eats, what eats it, parasites and pollinators
  7. trophiCH
  8. Wardeh et al. 2015 (EID2)
  9. DoPI