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Armillaria mellea

Armillaria mellea

कोई दर्ज सामान्य नाम नहीं

पेड़ के तने के आधार पर गुच्छों में उगे शहद-भूरे रंग के फफूंद, जिनके तने पर एक स्पष्ट झिल्लीदार वलय दिखाई देता हैफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

एक नज़र में

इसके लिए जाना जाता है
वनवनभूमिशहरीअशांत भूमि
वर्गीकरण
संघ
Basidiomycota
वर्ग
Agaricomycetes
गण
Agaricales
कुल
Physalacriaceae
वंश
Armillaria
प्रजाति
Armillaria mellea

Armillaria mellea का माइसेलियम सक्रिय रूप से बढ़ते समय अंधेरे में स्वयं प्रकाश उत्पन्न कर सकता है, यानी यह जैव-प्रदीप्त (bioluminescent) होता है, जबकि इसका फलन-काय स्वयं चमकता नहीं है।

यह Basidiomycota संघ का एक खाद्य कवक है, जो शहद-कवक (honey fungus) नाम से जाने जाने वाले Armillaria वंश से संबंधित है। यह एक आनुवंशिक रूप से जटिल और रूपात्मक रूप से एक-दूसरे से मिलती-जुलती प्रजातियों के समूह का हिस्सा है, जिन्हें अलग पहचानना कठिन होता है। यह मुख्यतः एक वृक्ष-रोगजनक है, जो कई पौधों में Armillaria जड़ सड़न रोग उत्पन्न करता है और संक्रमित वृक्षों के आधार पर मशरूम उगाता है। संक्रमित वृक्षों की शाखाओं में पत्तियों का रंग बदलना, वृद्धि रुकना, शाखाओं का सूखना और अंततः मृत्यु जैसे लक्षण दिखते हैं।

यह प्रजाति उत्तरी शीतोष्ण क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैली हुई है और वृक्षों के लिए घातक होते हुए भी वानिकी और परिवेशीय पारिस्थितिकी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जीवन और क्षय के चक्र को भूमिगत रूप से दर्शाती है।

फलन काय और पहचान

इस कवक की सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता इसका शहद-रंग का चिपचिपा टोपी (cap) है, जो 3 से 15 सेंटीमीटर व्यास का होता है। युवावस्था में यह उत्तल होता है, समय के साथ चपटा हो जाता है, अक्सर बीच में एक उभरा हुआ बिंदु (umbo) रहता है, और परिपक्व होने पर तली की तरह अवतल आकार ले लेता है। रंग में भिन्नता होती है और बीच में कुछ गहरे, बालदार शल्क रेडियल पैटर्न में दिख सकते हैं।

गलफड़े (gills) शुरू में सफेद होते हैं, उम्र के साथ हल्के गुलाबी-पीले या धब्बेदार हो जाते हैं, वे चौड़े और थोड़े दूर-दूर होते हैं तथा तने से समकोण पर या हल्के अवरोही रूप से जुड़े होते हैं। टोपी का मांस सफेदी लिए होता है, जिसमें मधुर गंध और स्वाद के साथ हल्की कड़वाहट होती है।

तना 5 से 20 सेंटीमीटर लंबा और 0.5 से 3.5 सेंटीमीटर व्यास का होता है, शुरुआत में रेशेदार और स्पंजी होता है, बाद में भीतर से खोखला हो जाता है। यह ऊपरी सिरे पर सफेद और नीचे भूरा-पीला होता है, आधार अक्सर बहुत गहरे रंग का रहता है, जहाँ यह गुच्छे के अन्य तनों से जुड़ा रहता है। तने के ऊपरी भाग पर एक चौड़ी, झिल्लीदार वलय (ring) स्थायी रूप से टिकी रहती है, जिसका किनारा मखमली और नीचे पीला-सा रोमयुक्त होता है, यह युवा गलफड़ों की सुरक्षा करती है।

सूक्ष्मदर्शी के नीचे बीजाणु (spores) लगभग दीर्घवृत्ताकार, 6–9 गुणा 5–7 माइक्रोमीटर आकार के होते हैं, जिनके आधार पर स्पष्ट नोकदार प्रवर्ध (apiculi) होते हैं। बीजाणु-मुद्रण (spore print) सफेद रंग का होता है। भूमिगत भाग में मायसीलियम के धागे दूर-दूर तक फैलते हैं और काले रंग की मोटी संरचनाओं—राइज़ोमॉर्फ्स (rhizomorphs)—में बंधे रहते हैं। दिखने में मिलती-जुलती प्रजातियों में Armillaria gemina में टोपी का पीला आधार रंग नहीं होता, जबकि Armillaria nabsnona का रंग अधिक गहरा होता है।

वितरण और आवास

यह प्रजाति उत्तरी शीतोष्ण क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाई जाती है, जिसमें संपूर्ण उत्तरी अमेरिका, यूरोप और उत्तरी एशिया शामिल हैं। इसे दक्षिण अफ्रीका में भी लाया गया है, जहाँ यह अपने प्राकृतिक क्षेत्र से बाहर स्थापित हो गई है।

यह मुख्यतः चौड़ी-पत्ती वाले पर्णपाती वृक्षों की एक बड़ी संख्या पर परजीवी रूप से उगती है और तनों या ठूँठों के आधार पर घने गुच्छों में फलन-काय उत्पन्न करती है, जो इसके संक्रमण का सबसे स्पष्ट बाहरी संकेत है।

मासिक निरीक्षण आंकड़ों में देखी गई उपस्थिति में सितंबर और अक्तूबर के महीनों में स्पष्ट वृद्धि दिखाई देती है, जो शरद ऋतु में इसके फलन-काय के अधिक दिखने का संकेत देती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये आंकड़े केवल इस बात को दर्शाते हैं कि किन महीनों में कवक देखा गया, न कि इसकी वास्तविक बहुतायत या इसके संपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र को।

Armillaria mellea के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
16,957
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

पारिस्थितिकी और संबंध

यह कवक मुख्यतः दृढ़काष्ठ (hardwood) और शंकुधारी वृक्षों के साथ परजीवी संबंध बनाता है, जिसमें बगीचे, वृक्षारोपण वन, अंगूर के बाग़ और कुछ शाकीय पौधे भी शामिल हैं। यह नम मिट्टी और कम मिट्टी तापमान को पसंद करता है, और जब मिट्टी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है तो इसकी वृद्धि रुक जाती है। यह वन में लगी आग जैसी अतिशय परिस्थितियों को भी मिट्टी की सुरक्षा के कारण सहन कर लेता है।

यह कवक नए मेज़बानों को दो तरीकों से संक्रमित करता है—राइज़ोमॉर्फ्स के माध्यम से, जो प्रति वर्ष एक मीटर तक बढ़ सकते हैं, और बीजाणुओं (basidiospores) के माध्यम से, जिनका सफल संक्रमण दुर्लभ होता है और वे अधिकतर लकड़ी के मलबे को उपनिवेशित करते हैं। जब राइज़ोमॉर्फ्स मिट्टी में घूमते हुए किसी स्वस्थ जड़ से मिलते हैं, तो वे छाल और लकड़ी के बीच बढ़ते हुए काष्ठ का क्षय, वृद्धि में कमी और वृक्ष की मृत्यु का कारण बनते हैं। तनाव में पड़े वृक्ष अधिक संवेदनशील होते हैं, लेकिन स्वस्थ वृक्ष भी संक्रमित हो सकते हैं।

संक्रमण के संकेत भूमिगत होने के कारण देखना कठिन होता है—छाल के नीचे सफेद, पंखे-जैसे मायसीलियम और मिट्टी में 0.8 से 3.2 मिलीमीटर व्यास के काले राइज़ोमॉर्फ्स अधिक भरोसेमंद संकेत माने जाते हैं, क्योंकि मशरूम केवल कुछ समय के लिए दिखते हैं और अन्य प्रजातियों से भ्रमित हो सकते हैं। यह प्राकृतिक और कृषित दोनों परिवेशों में वृक्षों और झाड़ियों की मृत्यु के सबसे सामान्य कारणों में से एक है। कुछ भृंग प्रजातियाँ, जैसे Tritoma biguttata biguttata और Tritoma atriventris, कभी-कभी इसे भोजन के रूप में खाती हैं, हालांकि पुराने अभिलेखों में यह स्पष्ट नहीं है कि वे इसी सीमित परिभाषा वाली प्रजाति का उल्लेख करते हैं या किसी संबंधित प्रजाति का।

उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास

Gastrodia elata नामक एक गैर-प्रकाशसंश्लेषी ऑर्किड, जिसका उपयोग पारंपरिक चीनी चिकित्सा में होता है, की खेती में सहायता के लिए 1994 से इस कवक के मायसीलियम की खेती की जा रही है, जिसमें कवक से संक्रमित लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग होता है। वर्ष 2017 में हेइलोंगजियांग प्रांत के किसानों ने लकड़ी के टुकड़ों और थैलीबंद माध्यम—दोनों विधियों से इसके फलन-काय (मशरूम) उगाने में सफलता प्राप्त की, और 2019 तक Gastrodia की खेती से बची मायसीलियम-युक्त लकड़ी को नई लकड़ी बीजारोपण के लिए नियमित रूप से उपयोग किया जाने लगा।

यह एक अच्छा खाद्य मशरूम माना जाता है, हालांकि इसका कठोर तना आमतौर पर छोड़ दिया जाता है और इसे युवावस्था में एकत्रित करके अच्छी तरह पकाया जाना आवश्यक होता है। इसका स्वाद हल्का मीठा और कुछ अखरोट जैसा बताया गया है, तथा तैयारी की विधि के अनुसार इसकी बनावट चबाने योग्य से लेकर कुरकुरी तक हो सकती है। फलन-काय में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कम मात्रा में वसा पाई जाती है, साथ ही उच्च रेशा सामग्री भी होती है। कुछ स्वदेशी समुदायों में इसका औषधीय उपयोग एक रेचक (laxative) के रूप में भी होता रहा है।

सांस्कृतिक रूप से, कुछ क्षेत्रों में इसे सौभाग्य और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है, और जीवन तथा मृत्यु के चक्र से इसके संबंध ने इसे साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला में कलात्मक निरूपण का विषय भी बनाया है। साथ ही, यह प्रबंधित वनों, वृक्षारोपणों, बागों, अंगूर के बागों और उद्यानों के लिए एक गंभीर खतरा है, जिससे Armillaria जड़ सड़न रोग के कारण महत्वपूर्ण आर्थिक नुकसान होता है।

रोचक तथ्य

  1. वर्ष 1866 में इस कवक का उल्लेख इतिहास में दर्ज है, जो इसके द्वारा हुए आर्थिक नुकसान से जुड़ा है।
  2. पूर्वी यूरोप के कुछ क्षेत्रों में यह माना जाता था कि इस कवक द्वारा बनाए गए वृत्त ("फेयरी रिंग") आत्मिक संसार के द्वार होते हैं।
  3. कुछ संस्कृतियों में इसे सौभाग्य और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है, जिसके कारण यह साहित्य और कला में भी दिखाई देता है।
  4. यह प्रबंधित वनों, वृक्षारोपणों और बागों के लिए इतना बड़ा खतरा है कि यह पर्याप्त आर्थिक क्षति का कारण बन सकता है।

पारिस्थितिकी

आवास

  • वन
  • वनभूमि
  • शहरी
  • अशांत भूमि

फ़ोटो

20 फ़ोटो
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पेड़ के तने के आधार पर गुच्छों में उगे शहद-भूरे रंग के फफूंद, जिनके तने पर एक स्पष्ट झिल्लीदार वलय दिखाई देता हैफ़ोटो: via iNaturalist, licensed under CC0 1.0., CC0

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipedia