उत्तरी अमेरिका के ओरेगन राज्य में स्थित मालह्यूर नेशनल फॉरेस्ट में इस कवक का एक ही जीव इतने विशाल क्षेत्र में फैला पाया गया है कि उसे विश्व के सबसे बड़े ज्ञात जीवों में गिना जाता है।
Armillaria ostoyae Physalacriaceae कुल और Agaricales गण से संबंधित एक परजीवी कवक है, जो Basidiomycota संघ का सदस्य है। यह उत्तरी गोलार्ध के ठंडे क्षेत्रों के जंगलों में पाया जाता है, विशेषकर उत्तरी अमेरिका के ब्रिटिश कोलंबिया और प्रशांत नॉर्थवेस्ट क्षेत्र के साथ-साथ एशिया के कुछ हिस्सों में भी।
यह प्रजाति दिलचस्प है क्योंकि इसका माइसीलियम पेड़ों की छाल के नीचे काले, धागे जैसे रूपांतर बनाकर लंबी दूरी तक फैल सकता है, और यह अंधेरे में हल्की चमक (फॉक्सफायर) भी उत्पन्न करने में सक्षम है।
फलन काय और पहचान
इस कवक की सबसे भरोसेमंद पहचान इसके क्रीम-भूरे रंग, टोपी पर स्पष्ट शल्कों और तने पर सुविकसित कुंडली के संयोजन से होती है, जो उत्तरी अमेरिका में इसे अन्य Armillaria प्रजातियों से अलग करता है।
फलनकाय की गलफड़ें चौड़ी और पतली होती हैं, जो तने से नीचे की ओर बहती हुई (डिकरेंट) निकलती हैं और सफेद बीजाणु-मुद्रण छोड़ती हैं। तना कुंडली को परिपक्व अवस्था तक बनाए रखता है।
प्रजनन की शुरुआत बीजाणुओं से होती है, जो पर्यावरण में मुक्त होकर हवा या जंतुओं द्वारा फैलते हैं। जब समान प्रजाति के अलग-अलग संगम-प्रकार (मेटिंग टाइप) के बीजाणु आपस में मिलते हैं, तो वे गहरे भूरे और चपटे उपनिवेश बनाते हैं, जिनसे काले धागे जैसे राइज़ोमॉर्फ (शूस्ट्रिंग) विकसित होते हैं। यही रचनाएँ इस कवक को दूर तक पोषक तत्व खींचने और वृक्षों को संक्रमित करने में सक्षम बनाती हैं। इसका माइसीलियम अन्य कुछ Armillaria प्रजातियों की तरह हल्की चमक (फॉक्सफायर) भी दिखा सकता है।
यह कवक कभी-कभी Pholiota limonella (मॉटल्ड रॉट) से भ्रमित हो सकता है, क्योंकि दोनों के फलनकाय समान दिखते हैं, लेकिन केवल तब जब छाल के नीचे सफेद माइसीलियल पंखे जैसी संरचना मौजूद न हो।
वितरण और आवास
यह कवक मुख्यतः उत्तरी गोलार्ध के ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है, जहाँ यह शंकुधारी वृक्षों को अपना मेज़बान बनाता है। उत्तरी अमेरिका में यह ब्रिटिश कोलंबिया और प्रशांत नॉर्थवेस्ट के जंगलों में उगता है, और एशिया के कुछ भागों में भी इसकी उपस्थिति दर्ज है।
ब्रिटिश कोलंबिया के भीतर यह विभिन्न जैव-भौगोलिक-जलवायु क्षेत्रों में फैला हुआ है, लेकिन जड़ रोग की समस्या भीतरी क्षेत्रों के इंटीरियर सीडर हेमलॉक क्षेत्र में सबसे गंभीर मानी जाती है। यह प्रजाति भीतरी क्षेत्रों में अधिक सामान्य है, जबकि तटीय क्षेत्रों में भी इसकी मौजूदगी पाई जाती है।
पूर्वी ओरेगन के स्ट्रॉबेरी पर्वतों में स्थित मालह्यूर नेशनल फॉरेस्ट में इस कवक का एक उपनिवेश 3.5 वर्ग मील (लगभग 2,200 एकड़ या 9.1 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र में फैला पाया गया, जिसे विश्व की सबसे बड़ी ज्ञात कवक-कॉलोनी माना जाता है। इसकी तुलना ऑस्ट्रेलिया के समुद्री तल पर मिलने वाली Posidonia australis घास-मैदान और एस्पेन वृक्ष-समूह "पैंडो" से की जाती है। इसी प्रजाति की सहचरी Armillaria gallica का एक अन्य विशाल उपनिवेश मिशिगन के क्रिस्टल फॉल्स क्षेत्र में लगभग 91 एकड़ में फैला मिला है।
GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़ों में सितंबर से नवंबर के बीच, विशेष रूप से अक्टूबर में, अवलोकनों की संख्या स्पष्ट रूप से सबसे अधिक दर्ज की गई है। यह आँकड़ा केवल उपस्थिति दर्शाता है, न कि जीव की वास्तविक संख्या या पूर्ण वितरण-सीमा, फिर भी यह पतझड़ के मौसम में फलनकायों के अधिक दिखने के अनुरूप प्रतीत होता है।

पारिस्थितिकी और संबंध
Armillaria ostoyae कई व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण शंकुधारी वृक्षों, जैसे डगलस-फर, विभिन्न फर प्रजातियों, चीड़ और वेस्टर्न हेमलॉक के लिए एक गंभीर रोगजनक कवक है। संक्रमण मुख्यतः काले राइज़ोमॉर्फ धागों के माध्यम से होता है, और रोगजनकता का सीधा संबंध इन धागों के उत्पादन से जुड़ा है। दस वर्ष से कम उम्र के युवा वृक्ष संक्रमण से मृत्यु के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि बीस वर्ष से अधिक पुराने वृक्षों में मृत्यु दुर्लभ हो जाती है, यद्यपि शुष्क जलवायु वाले जंगलों में यह वृद्ध वृक्षों में भी हो सकती है।
भीतरी क्षेत्रों के वन-स्टैंड में संक्रमण अधिक सामान्य पाया गया है, जबकि तटीय क्षेत्रों में विषाणुता अधिक तीव्र होने के बावजूद मृत्यु-दर कम रहती है। संक्रमित वृक्षों की पहचान आधार से रिसते राल, मुकुट का पतला होना या रंग बदलना, छाल के नीचे सफेद माइसीलियल पंखे, जड़ों में प्रवेश करते काले राइज़ोमॉर्फ और पतझड़ में आधार के पास उगने वाले शहद-रंगी मशरूमों से की जाती है। रोग अक्सर वन-आवरण में खाली स्थानों के रूप में केंद्रित "रोग-केंद्र" बनाता है।
यह कवक कटे हुए ठूँठों में लगभग 50 वर्षों तक जीवित रह सकता है, और रासायनिक उपचार इसे पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाते। इसके प्रबंधन के लिए संवेदनशील प्रजातियों की जगह प्रतिरोधी प्रजातियाँ जैसे वेस्टर्न रेडसीडर या पर्णपाती वृक्ष लगाना, संक्रमित ठूँठों को हटाना और वृक्षों में तनाव कम करना प्रमुख उपाय माने जाते हैं। प्रारंभिक प्रयोगों में एक अन्य कवक Hypholoma fasciculare को इस प्रजाति के विस्तार को प्रतिस्पर्धात्मक रूप से सीमित करते देखा गया है, हालाँकि इसकी प्रभावशीलता की पुष्टि के लिए और अध्ययन आवश्यक है।
उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास
इस कवक के ऐतिहासिक अनुष्ठानिक, औषधीय या पाककला संबंधी उपयोग के बहुत कम प्रमाण मिलते हैं। संभवतः पारंपरिक समुदायों ने इसे इसकी विषाक्त छवि के कारण या अधिक स्वादिष्ट मानी जाने वाली अन्य मशरूम प्रजातियों की उपलब्धता के चलते टाला।
इसके विपरीत, कुछ स्रोत इसे "चयनित खाद्य" (choice edible) मानते हुए बताते हैं कि यह कुछ क्षेत्रों की स्थानीय पहचान और संस्कृति से जुड़ा रहा है, जहाँ इसे पारंपरिक भोज और व्यंजनों में शामिल किया जाता रहा है।
रोचक तथ्य
- लोकप्रिय लेखों में इसे "ह्यूमॉन्गस फंगस" (विशालकाय कवक) उपनाम दिया गया है, जो इसके भूमिगत नेटवर्क के आकार की ओर संकेत करता है।
- अपनी परजीवी प्रकृति के बावजूद, यह कवक पारिस्थितिकी तंत्र में एक अपघटक की भूमिका भी निभाता है और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायक माना जाता है।
- वैज्ञानिकों की रुचि इसके संभावित जैव-सुधार (बायोरेमेडिएशन) उपयोगों में भी बनी हुई है, यानी प्रदूषित परिस्थितियों की सफाई में इसकी संभावित भूमिका।
- वर्ष 1986 में जे. रिशबेथ द्वारा अंग्रेज़ी Armillaria प्रजातियों की संवर्धन (कल्चर) विशेषताओं पर किया गया अध्ययन इस कवक-समूह की वैज्ञानिक समझ में एक प्रारंभिक योगदान रहा।
पारिस्थितिकी
आवास
- वन
- पर्वत



