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Caretta caretta

Caretta caretta

कोई दर्ज सामान्य नाम नहीं

VUसुभेद्य
समुद्र में तैरता एक वयस्क हरा समुद्री कछुआ, जिसका कवच जैतूनी-भूरे रंग का चौड़ा और चपटा है, पीला प्लास्ट्रॉन और पैडल जैसे अगले फ्लिपर स्पष्ट दिखाई देते हैं।फ़ोटो: Ella McCausland, CC BY

माप

वज़न
156.5–156.5 kg
जीवनकाल
≤ 77 वर्ष
वर्गीकरण
संघ
Chordata
वर्ग
Testudines
कुल
Cheloniidae
वंश
Caretta
प्रजाति
Caretta caretta

Caretta caretta, यानी लॉगरहेड समुद्री कछुआ, दुनिया का सबसे बड़ा कठोर-कवच वाला कछुआ है और लेदरबैक कछुए के बाद सबसे बड़ा जीवित समुद्री कछुआ भी। इसका सिर असामान्य रूप से बड़ा और भारी होता है, जो इसे कठोर खोल वाले शिकार को चबाने की अनोखी क्षमता देता है।

यह एक समुद्री सरीसृप है, जो टेस्टुडिनीज़ गण और चेलोनिडाई परिवार का सदस्य है। यह अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागरों तथा भूमध्य सागर के गर्म और शीतोष्ण जल में पाया जाता है। IUCN की रेड लिस्ट में इसे संवेदनशील (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है।

यह कछुआ न केवल अपने आकार और लंबी दूरी के प्रवासन के लिए जाना जाता है, बल्कि अपने कवच पर बसे सैकड़ों छोटे जीवों के कारण इसे एक "चलती हुई चट्टान" भी कहा जाता है, जो इसे समुद्री जीवन-चक्र में एक विशेष स्थान देता है।

पहचान और रूप

लॉगरहेड की सबसे पहचानने योग्य विशेषता इसका बड़ा, चौड़ा और भारी सिर है, जो अन्य समुद्री कछुओं की तुलना में स्पष्ट रूप से अलग दिखता है। वयस्कों का वज़न सामान्यतः 80 से 200 किलोग्राम के बीच होता है, जिसका औसत लगभग 135 किलोग्राम है, जबकि सबसे भारी दर्ज नमूने का वज़न 545 किलोग्राम तक पाया गया है। सीधी रेखा में मापा गया कारापेस (ऊपरी कवच) 70 से 95 सेंटीमीटर तक होता है, औसतन लगभग 90 सेंटीमीटर, और सबसे बड़ा दर्ज कुल लंबाई का अनुमान 213 सेंटीमीटर तक जाता है।

सिर और कारापेस का रंग पीले-नारंगी से लाल-भूरे रंग के बीच होता है, जबकि प्लास्ट्रॉन (नीचे का कवच) हल्के पीले रंग का होता है। गर्दन और शरीर के किनारे ऊपर से भूरे और नीचे-किनारों पर पीले दिखते हैं। कवच दो हिस्सों में बँटा होता है—कारापेस और प्लास्ट्रॉन—जो कई प्लेटों या स्कूट्स से बने होते हैं: सामान्यतः 11 से 12 जोड़ी सीमांत स्कूट्स, पाँच केंद्रीय कशेरुकीय स्कूट्स और पाँच जोड़ी पार्श्व स्कूट्स। तीन जोड़ी इंफ्रामार्जिनल स्कूट्स कारापेस और प्लास्ट्रॉन को जोड़ते हैं, लेकिन लॉगरहेड अपने सिर या पैरों को कवच के भीतर नहीं खींच सकता।

लिंग-भेद केवल वयस्क अवस्था में ही दिखाई देता है। नर की पूंछ और नाखून मादा से अधिक लंबे होते हैं, जबकि उनका प्लास्ट्रॉन छोटा और कारापेस चौड़ा तथा कम गुंबदाकार होता है; नर का सिर भी सामान्यतः मादा से चौड़ा होता है। किशोर और उप-वयस्क कछुओं में बाहरी रूप से लिंग पहचानना संभव नहीं है, इसके लिए शारीरिक परीक्षण या ऊतक-अध्ययन आवश्यक होता है।

एक विशिष्ट पहचान चिह्न इसकी आँखों के पीछे स्थित लैक्रिमल ग्रंथियाँ हैं, जो समुद्री जल से अतिरिक्त नमक बाहर निकालती हैं—इससे यह भ्रम होता है कि कछुआ "रो" रहा है। खोपड़ी की बनावट में भी यह अन्य समुद्री कछुओं से अलग है, क्योंकि इसकी ऊपरी जबड़े की हड्डियाँ तालु के मध्य में मिलती हैं, और शक्तिशाली जबड़े की मांसपेशियों के कारण आँखों के पीछे का हिस्सा उभरा हुआ दिखता है।

वितरण और आवास

लॉगरहेड कछुए का वितरण विश्वव्यापी है और यह किसी भी समुद्री कछुए की तुलना में सबसे व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में अंडे देता है। यह अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागरों के साथ-साथ भूमध्य सागर में भी पाया जाता है।

अटलांटिक महासागर में इसकी सबसे बड़ी संख्या उत्तरी अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट और मेक्सिको की खाड़ी में मिलती है; फ्लोरिडा सबसे लोकप्रिय घोंसला स्थल है जहाँ प्रति वर्ष 67,000 से अधिक घोंसले बनते हैं, जबकि केप वर्डे द्वीप अटलांटिक के पूर्वी हिस्से का एकमात्र प्रमुख घोंसला स्थल है। हिंद महासागर में यह अफ्रीका, अरब प्रायद्वीप और अरब सागर के तटों पर भोजन करता है; ओमान में लगभग 15,000 घोंसले बनते हैं, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी घोंसला-आबादी है, और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में प्रति वर्ष 1,000–2,000 घोंसले दर्ज होते हैं। प्रशांत महासागर में पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और जापान—विशेष रूप से याकुशिमा द्वीप—प्रमुख घोंसला क्षेत्र हैं, जहाँ आस-पास की लगभग 40% आबादी अंडे देने आती है।

भूमध्य सागर किशोर कछुओं के लिए एक "नर्सरी" का काम करता है; यहाँ की लगभग 45% किशोर आबादी अटलांटिक से प्रवास कर आई होती है। ग्रीस—खासकर ज़ाकिन्थॉस और किपारिसिया खाड़ी—भूमध्य सागर का सबसे लोकप्रिय घोंसला स्थल है, जहाँ प्रति वर्ष 3,000 से अधिक घोंसले बनते हैं; साइप्रस और तुर्की के तट भी महत्वपूर्ण स्थल हैं।

जीवन-चक्र के अनुसार आवास बदलता रहता है: नवजात कछुए समुद्र में पहुँचने के बाद बहते हुए सारगासो जलशैवाल की चट्टों में रहते हैं, जबकि बड़े किशोर और वयस्क तटीय जल में चट्टानी या दलदली सतह पसंद करते हैं और भित्तियों, लैगून तथा नदी-मुखों में भी पाए जाते हैं, सामान्यतः 61 मीटर तक की गहराई में। GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़ों में गर्मियों के महीनों—विशेष रूप से जुलाई—में अवलोकनों की संख्या सबसे अधिक दिखती है, हालाँकि यह केवल उपस्थिति के आँकड़े हैं और आबादी के आकार का सीधा माप नहीं हैं।

Caretta caretta के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
25,138
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

व्यवहार और जीवनशैली

लॉगरहेड कछुए दिन के समय सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं और अपने दिन का लगभग 85% समय पानी में डूबे रहकर बिताते हैं। सामान्य डुबकी 15 से 30 मिनट तक चलती है, लेकिन ये कछुए दस घंटे से भी अधिक समय तक बिना सांस लिए पानी में रह सकते हैं—यह क्षमता किसी भी अन्य हवा में सांस लेने वाले समुद्री जंतु से अधिक है। आराम करते समय ये अपने अगले पैर आधे-तैराकी की मुद्रा में फैलाकर पानी में स्थिर पड़े रहते हैं, आँखें खुली या आधी बंद रहती हैं, जबकि रात में वे आँखें पूरी तरह बंद करके सोते हैं और उस समय धीमी प्रतिक्रिया देते हैं।

ये कछुए दूर-दूर तक प्रवास करते हैं—कुछ व्यक्तियों को 4,828 किलोमीटर तक की दूरी तय करते देखा गया है। शीतोष्ण जल में रहने वाले वयस्क और किशोर सर्दियों में भूमध्य रेखा की ओर पलायन करते हैं ताकि 10 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान वाले पानी में "कोल्ड-स्टनिंग" से बच सकें; यदि तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाए, तो कछुए की मृत्यु भी हो सकती है। वयस्क अपने ही जन्म स्थल के निकट लौटने की क्षमता (नैटल होमिंग) दिखाते हैं और वर्षों तक एक ही घोंसला-तट पर लौटते रहते हैं।

मादाओं में परस्पर आक्रामकता, जो अन्य समुद्री जंतुओं में दुर्लभ है, लॉगरहेड में आम देखी जाती है। यह टकराव मुख्यतः भोजन क्षेत्र पर अधिकार को लेकर होता है और चार चरणों में बढ़ता है—शुरुआती संपर्क, सिर-पूंछ घुमाकर की गई चुनौती, जबड़ों से काटने की झपट, और अंत में या तो दोनों का अलग होना या एक का दूसरे को भगाना। पूंछ का सीधा रहना आक्रामकता की तैयारी दर्शाता है, जबकि मुड़ी हुई पूंछ समर्पण का संकेत है।

संचार

संवाद में मुख्य रूप से दृष्टि, स्पर्श और रासायनिक संकेतों का उपयोग होता है। प्रेम-प्रसंग के दौरान नर और मादा एक-दूसरे को दृष्टि और स्पर्श से पहचानते हैं, जबकि रैथके ग्रंथि से निकलने वाली गंध दोनों को पास लाने में मदद करती मानी जाती है।

नवजात कछुए अंडों से निकलने के बाद, जो अधिकतर रात में होता है, समुद्र की दिशा तय करने के लिए क्षितिज पर सबसे तेज़ रोशनी—प्राकृतिक रूप से चाँद या तारों की चमक—की ओर बढ़ते हैं और तट की ढलान को भी महसूस करते हैं। पानी में पहुँचने के बाद वे रासायनिक और चुंबकीय संकेतों की मदद से धाराओं की दिशा तय करते हैं।

बड़े होने पर किशोर और वयस्क अपने लंबे प्रवासन के दौरान भी रासायनिक और चुंबकीय संकेतों पर निर्भर रहते हैं, और वे स्मृति के बिना केवल तात्कालिक संकेतों के आधार पर मार्ग खोजने में सक्षम होते हैं—यानी एक प्रकार का "नक्शा-आधारित" नेविगेशन। भोजन की खोज सामान्यतः दृष्टि या गंध के माध्यम से की जाती है।

आहार और पोषण

लॉगरहेड कछुआ मूलतः मांसाहारी है, लेकिन शैवाल और समुद्री पौधों को भी खाकर सर्वाहारी व्यवहार दिखाता है। इसका विशाल सिर और शक्तिशाली जबड़े इसे कठोर खोल वाले शिकार को कुचलने में सक्षम बनाते हैं, जैसे घोड़े की नाल केकड़े (Limulus polyphemus), द्विकपाटी शंख, बार्नेकल, शंबुक और शंख।

यह एक सामान्यवादी भक्षक है और इसके भोजन में स्पंज, जेलीफिश, सेफलोपॉड, झींगे, कीट, समुद्री अर्चिन और मछलियों के साथ मछली के अंडे भी शामिल हैं। पौधों में यह Ascophyllum, Ulothrix, Urospora और Sargassum जैसे शैवाल तथा Cymodocea, Thalassia और Zostera जैसे जलीय पौधे खाता है।

जीवन के विभिन्न चरणों में आहार में थोड़ा बदलाव आता है, लेकिन लॉगरहेड हर अवस्था में एक सामान्यवादी भक्षक ही बना रहता है, यानी उपलब्ध संसाधनों के अनुसार यह अपने भोजन को समायोजित कर लेता है।

घोंसला और प्रजनन

घोंसला मौसम शुरू होने से पहले नर लॉगरहेड घोंसला-तटों के निकट समुद्र में जमा होकर मादाओं का इंतज़ार करते हैं। प्रेम-प्रसंग में नर मादा के चारों ओर घूमता है, फिर उसकी गर्दन या कंधे को काटकर उस पर सवार होने का प्रयास करता है; यदि मादा अनिच्छुक हो तो वह अपना क्लोएका ढककर तल की ओर तैर जाती है, लेकिन दृढ़ नर उसके सांस लेने के लिए ऊपर आने का इंतज़ार करता रहता है। संभोग घंटों तक चल सकता है और इस दौरान अन्य नर सवार नर को टक्कर मारकर या काटकर हटाने की कोशिश करते हैं, जिससे उसे गंभीर चोटें भी लग सकती हैं। इस प्रजाति में संभोग से ही अंडोत्सर्ग (ओव्यूलेशन) प्रेरित होता है—यह विशेषता स्तनधारियों के बाहर बहुत दुर्लभ है।

प्रजनन तंत्र बहुपति-बहुपत्नी (पॉलिगायनैंड्रस) प्रकार का है, और एक मादा एक ही मौसम में कई नरों से संभोग कर सकती है क्योंकि वह शुक्राणु को अपने अंडवाहिनी में तब तक संग्रहित रखती है जब तक अंडोत्सर्ग न हो। इसके परिणामस्वरूप एक ही अंडे के समूह (क्लच) में सात अलग-अलग नरों का शुक्राणु मिल सकता है।

घोंसला बनाने के लिए मादा हर 12 से 17 दिनों के अंतराल पर तट पर लौटती है और एक मौसम में औसतन 3.9 बार अंडे देती है। तट पर पहुँचकर वह अपने पिछले पैरों से एक गड्ढा खोदती है, उसमें औसतन 112.4 अंडे (सीमा 23 से 198) रखती है, फिर उसे रेत से ढककर समुद्र में लौट जाती है—यह पूरी प्रक्रिया एक से दो घंटे तक चलती है। अंडे तापमान के अनुसार 45 से 80 दिनों में फूटते हैं। यौन परिपक्वता तब आती है जब कारापेस की लंबाई 90 सेंटीमीटर से अधिक हो जाती है, जो सामान्यतः 10 से 30 वर्ष की आयु में होता है।

अंडे देने के बाद माता-पिता की ओर से कोई सीधी देखभाल नहीं होती; मादा का पूरा निवेश अंडे देने से पहले ही होता है, जिसमें भ्रूण के विकास के लिए पोषक जर्दी प्रदान करना शामिल है। यह जर्दी नवजात कछुए को कुछ दिनों या हफ्तों तक ऊर्जा देती रहती है।

आबादी और पारिस्थितिक भूमिका

Caretta caretta को कभी-कभी "मूल प्रजाति" (कीस्टोन स्पीशीज़) कहा जाता है क्योंकि यह बड़ी मात्रा में अकशेरुकी जीवों को खाकर उनकी आबादी को नियंत्रित करता है, और उनके टूटे खोल अन्य समुद्री जीवों के लिए कैल्शियम का स्रोत बनते हैं। इसके अलावा, इसके अंडों का एक बड़ा हिस्सा शिकारियों का भोजन बनता है, जिससे यह खाद्य-जाल में कई स्तरों पर योगदान देता है।

इसके कवच पर 13 संघों (फाइला) की 100 से अधिक प्रजातियाँ रहती हैं, जिनमें बार्नेकल, शैवाल और स्केलेटन झींगे शामिल हैं—इस कारण एक लॉगरहेड को "चलती-फिरती चट्टान" भी कहा जाता है। 2018 में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 24 कछुओं की जाँच में औसतन 33,000 सूक्ष्म जीव प्रति कवच पाए, और एक कछुए पर 150,000 से अधिक जीव मिले।

अंडे और नवजात कछुए भूत-केकड़ों, चींटियों, पक्षियों, लकड़बग्घों, रैकून और लाल लोमड़ी जैसे कई शिकारियों का निशाना बनते हैं। ऑस्ट्रेलिया में 19वीं सदी में लाई गई लाल लोमड़ी (Vulpes vulpes) के कारण एक तटीय क्षेत्र में 1970 के दशक में 95% तक अंडों के समूह नष्ट हो गए थे, जबकि दक्षिण-पूर्वी अमेरिका के तटों पर रैकून के कारण कुछ फ्लोरिडा तटों पर लगभग सभी क्लच नष्ट होने के मामले दर्ज किए गए हैं। वयस्क कछुओं पर बड़े शार्क, भिक्षु सील और किलर व्हेल हमला करते हैं, हालांकि उनका बड़ा आकार उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा देता है।

संरक्षण और खतरे

IUCN रेड लिस्ट में Caretta caretta को संवेदनशील (Vulnerable) दर्जा दिया गया है, जो दर्शाता है कि यह प्रजाति निकट भविष्य में विलुप्त होने के खतरे के करीब पहुँच सकती है यदि इसकी गिरावट जारी रही। दुनिया भर में इसकी सबसे बड़ी गिरावट का कारण मछली पकड़ने के उपकरणों में अनजाने में फँसना है—जैसे लॉन्गलाइन, गिलनेट और झींगा ट्रॉल—साथ ही मांस और अंडों के लिए सीधे शिकार भी एक बड़ा कारण है।

अन्य महत्वपूर्ण खतरों में तटीय क्षेत्रों का विकास, घोंसला बनाने वाली मादाओं की मानवीय गतिविधियों से बाधा, कीटनाशक और तेल-रिसाव जैसे प्रदूषक, रैकून जैसे शिकारियों की मानव-प्रेरित बढ़ोतरी, नावों से टकराव और चैनल-ड्रेजिंग शामिल हैं। तटों पर कृत्रिम रोशनी नवजात कछुओं को भ्रमित कर उन्हें समुद्र से दूर खतरनाक शहरी इलाकों की ओर मोड़ देती है, जिससे हर साल हज़ारों नवजात कछुओं की मृत्यु होती है। समुद्र में तैरता प्लास्टिक कचरा जेलीफिश जैसा दिखने के कारण इनके द्वारा निगल लिया जाता है, जिससे आंत्र-अवरोध, कुपोषण और विषाक्तता जैसी समस्याएँ होती हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे संकटग्रस्त (Threatened) प्रजाति का दर्जा दिया गया है और यह CITES परिशिष्ट I में सूचीबद्ध है। मछली पकड़ने के जालों में टर्टल एक्सक्लूज़न डिवाइस (TED) अनिवार्य किए गए हैं और उन देशों से झींगे के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया है जो इन उपकरणों का उपयोग नहीं करते। इन उपायों के बावजूद अमेरिकी जल में इनकी संख्या अभी भी घट रही है।

संरक्षण स्थिति

  1. LC
  2. NT
  3. VU
  4. EN
  5. CR

सुभेद्य

सांस्कृतिक महत्व

प्राचीन कला और पौराणिक कथाओं में समुद्री कछुए को अक्सर ज्ञान, दीर्घायु और समुद्र से जुड़ाव के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। यूनानी पौराणिक कथाओं में भी इस कछुए को विशेष सम्मान प्राप्त था।

हिंदू परंपरा से जुड़े ग्रंथों में कछुए को अहिंसा के सिद्धांत—यानी सभी जीवित प्राणियों को हानि न पहुँचाने—के पालन से जोड़ा गया है, जो धर्म और नैतिक जीवन के व्यापक सांस्कृतिक ढाँचे में इसकी भूमिका को दर्शाता है।

मानव जीवन में इसका प्रत्यक्ष उपयोग भी है: यह इकोटूरिज़्म का एक बड़ा आकर्षण है, जिसमें लोग स्नॉर्कलिंग, डाइविंग या घोंसला बनाने की प्रक्रिया देखने आते हैं। अमेरिकी जल में यह सबसे सामान्य समुद्री कछुआ होने के कारण सबसे अधिक वैज्ञानिक शोध का विषय भी है, हालांकि मध्य व दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और भूमध्य सागर के कुछ क्षेत्रों में इसके मांस और अंडों का सेवन आज भी जारी है।

रोचक तथ्य

  1. 1996 में एडेलिटा नाम की मादा लॉगरहेड ने मेक्सिको से जापान तक 14,500 किलोमीटर की यात्रा की—यह किसी जानवर का दर्ज किया गया पहला महासागर-पार प्रवासन था।
  2. यह कछुआ दस घंटे से अधिक समय तक बिना सांस लिए पानी में रह सकता है, जो किसी भी अन्य हवा में सांस लेने वाले समुद्री जंतु से अधिक है।
  3. एक ही लॉगरहेड के कवच पर 13 संघों की 100 से अधिक प्रजातियाँ रह सकती हैं; एक अध्ययन में एक कछुए पर 150,000 से अधिक सूक्ष्म जीव पाए गए।
  4. इसकी आँखों के पीछे मौजूद लैक्रिमल ग्रंथियाँ अतिरिक्त नमक बाहर निकालती हैं, जिससे तट पर मादा कछुआ "रोती" हुई प्रतीत होती है।
  5. इस प्रजाति में संभोग से ही अंडोत्सर्ग होता है—यह विशेषता स्तनधारियों के बाहर अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है।
  6. एक ही अंडों के समूह (क्लच) में सात अलग-अलग नरों का शुक्राणु मिल सकता है, क्योंकि मादा शुक्राणु को अपने शरीर में संग्रहित रख सकती है।

पारिस्थितिकी

आवास

  • आर्द्रभूमि
  • समुद्री
  • तटीय

व्यवहार

  • एकांतप्रिय
  • क्षेत्रीय
  • दिवाचर
  • प्रवासी

आहार

  • सर्वाहारी

फ़ोटो

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समुद्र में तैरता एक वयस्क हरा समुद्री कछुआ, जिसका कवच जैतूनी-भूरे रंग का चौड़ा और चपटा है, पीला प्लास्ट्रॉन और पैडल जैसे अगले फ्लिपर स्पष्ट दिखाई देते हैं।फ़ोटो: Ella McCausland, CC BY

स्रोतGBIFiNaturalistWikidataWikipediaEncyclopedia of LifeAnimal Diversity WebAnAge