Castanea sativa, जिसे अंग्रेज़ी में स्वीट चेस्टनट, स्पैनिश चेस्टनट या यूरोपियन चेस्टनट कहा जाता है, अपनी असाधारण दीर्घायु के लिए जाना जाता है। यह वृक्ष स्वाभाविक रूप से 500 से 600 वर्ष तक जीवित रहता है, और खेती के अंतर्गत उगाए गए कुछ वृक्ष 1000 वर्ष से भी अधिक आयु तक पहुँच जाते हैं।
यह Fagaceae कुल का एक पर्णपाती वृक्ष है, जो ओक और बीच जैसे वृक्षों के साथ एक ही परिवार से संबंधित है। यह दक्षिणी यूरोप और एनातोलिया का मूल निवासी है, और वर्तमान में इसे IUCN द्वारा "लीस्ट कंसर्न" (कम चिंताजनक) श्रेणी में रखा गया है।
सदियों तक लकड़ी और फल दोनों के लिए मूल्यवान रहा यह वृक्ष, यूरोप के इतिहास, संस्कृति और अर्थव्यवस्था में गहराई से जुड़ा हुआ है, जो इसे केवल एक वनस्पति प्रजाति से कहीं अधिक बनाता है।
पहचान और रूप
इस वृक्ष की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी जालनुमा छाल है, जिस पर गहरी दरारें तने पर दोनों दिशाओं में सर्पिल आकार में ऊपर की ओर बढ़ती हैं। तना अधिकतर सीधा होता है और शाखाएँ नीचे की ऊँचाई से ही निकलने लगती हैं।
परिपक्व वृक्ष सामान्यतः 20 से 35 मीटर ऊँचे होते हैं, और तना अक्सर 2 मीटर व्यास तक पहुँच जाता है। लगभग 20 दर्ज किए गए वृक्षों का व्यास 4 मीटर से अधिक है, जिनमें एक वृक्ष का व्यास वृक्ष-ऊँचाई पर 7.5 मीटर तक मापा गया है। पत्तियाँ आयताकार-भालाकार, तीखे दाँतों वाली, 15 से 32 सेंटीमीटर लंबी और 5 से 10 सेंटीमीटर चौड़ी होती हैं।
फूल दोनों लिंगों के होते हैं और 10 से 20 सेंटीमीटर लंबी सीधी बालियों में लगते हैं—नर फूल ऊपरी भाग में और मादा फूल नीचे के भाग में। उत्तरी गोलार्ध में ये जून के अंत से जुलाई तक खिलते हैं। यह प्रजाति स्वयं-असंगत होती है, अर्थात यह अपने ही पराग से निषेचित नहीं हो सकती, जिससे पर-परागण आवश्यक होता है।
शरद ऋतु में मादा फूल कँटीले आवरण (कपुल) में बदल जाते हैं, जिनमें 3 से 7 भूरे रंग के मेवे होते हैं जो अक्टूबर में गिरते हैं। यह कँटीला आवरण बीज को शिकारियों से बचाता है। मेवे की दो परतें होती हैं—बाहरी चमकदार भूरी परत और भीतर एक झिल्ली, जिसके भीतर मलाईदार-सफेद खाद्य भाग होता है।
वितरण और आवास
यह प्रजाति मूलतः दक्षिणी यूरोप और एनातोलिया की निवासी है, और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कैस्पियन सागर से अटलांटिक महासागर तक फैली हुई पाई जाती है। माना जाता है कि यह अंतिम हिमयुग के दौरान दक्षिणी यूरोप, काला सागर के दक्षिणी तट, काकेशस की दक्षिणी ढलानों और उत्तर-पश्चिमी सीरिया (संभवतः लेबनान तक फैले) क्षेत्रों में शरणस्थलों में जीवित रही।
2004 के आँकड़ों के अनुसार, यूरोप में यह वृक्ष लगभग 22,50,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र में उगाया जाता था, जिसमें से 17,80,000 हेक्टेयर मुख्यतः लकड़ी के लिए और 4,30,000 हेक्टेयर फल उत्पादन के लिए समर्पित थे। स्लोवाकिया और नीदरलैंड जैसे कुछ यूरोपीय देशों में इसे हाल ही में लाया गया है।
वृक्ष को अच्छी वृद्धि और मेवा उत्पादन के लिए समशीतोष्ण जलवायु और पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। इसका वार्षिक नया विकास (पूरा वृक्ष नहीं) वसंत के अंत और शरद ऋतु की शुरुआत की ठंड के प्रति संवेदनशील होता है, और यह चूनेदार मिट्टी को सहन नहीं करता। वन परिस्थितियों में यह मध्यम छाया को अच्छी तरह सहन कर लेता है।
GBIF के मासिक अवलोकन आँकड़े मई से जुलाई के बीच सबसे अधिक हैं—जून में सबसे अधिक 41,308 अवलोकन दर्ज किए गए—जो इस अवधि में फूल आने और पत्तियों के पूर्ण विकास के साथ मेल खाता प्रतीत होता है। ध्यान रहे, ये आँकड़े केवल उपस्थिति दर्शाते हैं, न कि जनसंख्या घनत्व या संपूर्ण मूल वितरण क्षेत्र की जानकारी।

पारिस्थितिकी और संबंध
पत्तियाँ कई शाकाहारी कीटों के लिए भोजन का स्रोत बनती हैं, जिनमें लेपिडोप्टेरा प्रजाति Coleophora anatipennella (केस-बियरर मॉथ) और उत्तर अमेरिकी Macrodactylus subspinosus (रोज़ चेफर) शामिल हैं।
इस वृक्ष के लिए दो प्रमुख कवक रोग गंभीर खतरा रहे हैं: चेस्टनट ब्लाइट (Cryphonectria parasitica) और इंक डिज़ीज़ (Phytophthora cambivora तथा P. cinnamomi के कारण)। 20वीं सदी में चेस्टनट ब्लाइट ने उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी यूरोप में अधिकांश चेस्टनट आबादी को नष्ट कर दिया था, हालाँकि जैविक नियंत्रण के माध्यम से अब यह वृक्ष फिर से पुनर्जीवित हो रहा है। इंक डिज़ीज़ नम मिट्टी में अधिक फैलती है—इसका कवक-तंतु जड़ों पर आक्रमण करता है, जिससे पत्तियाँ मुरझा जाती हैं और तने के आधार पर काला स्राव दिखाई देता है; अब कुछ प्रतिरोधी किस्में भी उपलब्ध हैं।
एक और गंभीर कीट, एशिया से दक्षिणी यूरोप में लाया गया गॉल वास्प (Dryocosmus kuriphylus), है, जिसे नियंत्रित करना कठिन माना जाता है। वृक्ष के फलने-फूलने के लिए समशीतोष्ण जलवायु और पर्याप्त नमी आवश्यक होती है।
उपयोग और मानव संबंध
मानव द्वारा इस वृक्ष के प्रसार के प्रमाण पराग-आँकड़ों से मिलते हैं, जो लगभग 2100-2050 ईसा पूर्व एनातोलिया, उत्तर-पूर्वी ग्रीस और दक्षिण-पूर्वी बुल्गारिया में इसकी शुरुआत दर्शाते हैं, हालाँकि यह अन्य फसलों की तुलना में एक अपेक्षाकृत छोटी और असमान रूप से फैली फसल थी। सबसे पुराने कोयले के अवशेष लगभग 850-950 ईसा पूर्व के मिलते हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में थियोफ्रास्टस के लेखन में मुख्यतः इसकी लकड़ी के उपयोग—इमारती लकड़ी और कोयले के रूप में—का उल्लेख है, जबकि फल का उल्लेख केवल एक बार पाचन संबंधी कठिनाइयों के संदर्भ में हुआ है, साथ ही इसके पोषण-गुण की प्रशंसा भी की गई। कुछ यूनानी लेखकों ने इसे होंठ और ग्रासनली के घावों के लिए औषधीय उपयोग में भी बताया।
यह वृक्ष यूनानी उपनिवेशीकरण के दौरान इटली में लाया गया माना जाता है; प्लिनी द एल्डर ने इसकी खेती को केवल यूनानी उपनिवेशों से जोड़ा है। हालाँकि, रोमन कुलीन वर्ग को इसका फल पसंद नहीं था—प्लिनी ने टिप्पणी की कि प्रकृति ने इस "अल्प-मूल्य" फल को कितनी अच्छी तरह छुपाया है। ईसा पूर्व युग के अंत तक इटली में इसका प्रसार सीमित ही रहा, हालाँकि माउंट वेसुवियस के विस्फोट (79 ईस्वी) से नष्ट हुए पोम्पेई के निकट एक रोमन विला में कोयले जैसे जले हुए मेवे मिले हैं।
ईसाई युग की शुरुआत में लोगों ने इसकी लकड़ी के मूल्य और बहुउपयोगिता को समझा, जिससे इसकी खेती धीरे-धीरे फैली—100 से 600 ईस्वी के बीच खंभों, सहायक संरचनाओं, काष्ठकला और घाट-निर्माण में इसका उपयोग बढ़ा। मध्यकाल की शुरुआत में पश्चिमी यूरोप में इसका व्यापक उपयोग शुरू हुआ और उत्तर मध्यकाल में यह फला-फूला; सातवीं शताब्दी के लोम्बार्ड कानून (एडिक्टम रोथारी, 643 ईस्वी) में किसी और के चेस्टनट वृक्ष को काटने पर एक सॉलिडी का जुर्माना निर्धारित था। 20वीं सदी की शुरुआत से ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी घटने, इसे मुख्य भोजन के रूप में छोड़ने, तथा चेस्टनट ब्लाइट और इंक डिज़ीज़ के फैलाव के कारण इसकी खेती में भारी गिरावट आई। आज उच्च-मूल्य वाले चेस्टनट उत्पादों के विकास और शहरी समाज की बदलती आवश्यकताओं के कारण इसकी खेती में पुनरुत्थान देखा जा रहा है। इसकी खेती की एक पद्धति कॉपिसिंग है, जो मुख्यतः लकड़ी निकालने के लिए अपनाई जाती है।
रोचक तथ्य
- प्राचीन यूनानियों ने स्वीट चेस्टनट वृक्ष को देवता ज़ीयस को समर्पित माना था।
- Castanea नाम ग्रीस के थेसाली क्षेत्र के एक नगर "कास्टोनिस" (या कास्टानम) से लिया गया है, जहाँ इसे इसके मेवों के लिए बड़े पैमाने पर उगाया जाता था।
- प्रजाति नाम sativa लैटिन शब्द से आया है, जिसका अर्थ है "कृषित" या "खेती किया गया"।
- इस वृक्ष का पुराना अंग्रेज़ी नाम "चेस्टन-नट" (Chesten-nut) था।
- यह वृक्ष Fagaceae कुल का सदस्य है, जिससे ओक और बीच वृक्ष भी संबंधित हैं।
संरक्षण स्थिति
- LC
- NT
- VU
- EN
- CR
संकटमुक्त
पारिस्थितिकी
आवास
- वन
- पर्वत
वृद्धि का रूप
- वृक्ष



