Coprinus comatus, जिसे सामान्यतः शैगी इंक कैप या शैगी मेन कहा जाता है, तोड़े जाने या बीजाणु छोड़ने के कुछ ही घंटों के भीतर काला होकर स्वयं एक स्याही जैसे तरल में घुल जाता है। यह इस कवक की सबसे विचित्र और पहचान योग्य विशेषता है।
यह Agaricaceae कुल का एक कवक है, जो Basidiomycota संघ के Agaricomycetes वर्ग से संबंध रखता है। शुरुआत में यह जमीन से सफेद बेलनाकार आकृति के रूप में निकलता है, फिर इसकी टोपी घंटी के आकार में खुलती है। IUCN ने इस प्रजाति को "संकटमुक्त" (Least Concern) श्रेणी में रखा है।
इसकी टोपी के नीचे की गलियां पहले सफेद, फिर गुलाबी और अंत में काली हो जाती हैं, इससे पहले कि वे स्वयं तरल में बदल जाएं। यह क्षणभंगुर जीवन-चक्र ही इसे कवकों की दुनिया में एक असामान्य और उल्लेखनीय उदाहरण बनाता है।
फलन काय और पहचान
इस कवक की सबसे पहचान योग्य विशेषता इसकी लगभग बेलनाकार टोपी है, जो शुरुआत में तने के अधिकांश भाग को ढके रहती है। टोपी की चौड़ाई 4 से 8 सेंटीमीटर और ऊंचाई 6 से 20 सेंटीमीटर तक होती है। यह मुख्यतः सफेद रंग की होती है और इस पर झालरदार पर्तें (scales) होती हैं, जो शीर्ष की ओर हल्की भूरी हो जाती हैं।
मुक्त गलियां तेजी से रंग बदलती हैं—पहले सफेद, फिर गुलाबी, और अंत में द्रवीभूत होकर एक काले तरल में बदल जाती हैं जिसमें बीजाणु भरे होते हैं। यही प्रक्रिया इसे "इंक कैप" नाम देती है। सफेद और मोटा तना 6 से 40 सेंटीमीटर लंबा तथा 1 से 2.5 सेंटीमीटर व्यास का होता है, जिसके निचले हिस्से में एक ढीली अंगूठी (ring) पाई जाती है।
सूक्ष्मदर्शी से देखने पर इसमें प्लूरोसिस्टीडिया (pleurocystidia) अनुपस्थित होते हैं। बीजाणु मुद्रण (spore print) काला-भूरा होता है और बीजाणुओं का आकार 10 से 13 गुणा 6.5 से 8 माइक्रोमीटर होता है। मांस सफेद और स्वाद में सामान्य (mild) होता है।
वितरण और आवास
यह कवक मुख्यतः उत्तरी अमेरिका और यूरोप के घास के मैदानों तथा चरागाहों में समूहों में उगता है। ब्रिटेन में यह जून से नवंबर तक फलन देता है। यह ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और आइसलैंड में भी पहुंचाया गया प्रतीत होता है, जहां यह मूल रूप से नहीं पाया जाता था।
यह सीधे मिट्टी पर, लॉन पर, सड़कों या पैदल रास्तों के किनारे और मानव-हस्तक्षेप से बदली हुई मिट्टी में उगता है। इससे स्पष्ट होता है कि यह प्रजाति प्राकृतिक और मानव-प्रभावित दोनों प्रकार के परिवेशों में पनप सकती है।
GBIF के मासिक अवलोकन आंकड़े केवल उपस्थिति के अभिलेख हैं, न कि जनसंख्या घनत्व या पूर्ण वितरण क्षेत्र के संकेतक। इसके बावजूद, आंकड़ों में सितंबर से नवंबर के महीनों के दौरान अवलोकनों में स्पष्ट वृद्धि दिखती है, जिसमें अकेले अक्टूबर में सबसे अधिक अवलोकन दर्ज किए गए हैं। यह पैटर्न सावधानीपूर्वक शरद ऋतु में इसकी अधिक सक्रिय उपस्थिति की ओर संकेत करता है।

पारिस्थितिकी और संबंध
यह कवक भूमिगत मिट्टी पर सीधे उगता है, विशेषकर घास के मैदानों, चरागाहों, सड़कों के किनारों और मानव द्वारा बदली गई मिट्टी में। ये स्थान इसके फलन के लिए मुख्य आधार बनते हैं।
इस प्रजाति की एक विशेष पारिस्थितिक भूमिका भी है—यह एक नेमेटोफेगस (nematophagous) कवक है, जो सूत्रकृमियों (nematodes) को पकड़कर मार सकता है और पचा सकता है। यह विशेष रूप से Panagrellus redivivus और Meloidogyne arenaria प्रजातियों के सूत्रकृमियों को नष्ट करने में सक्षम पाया गया है।
यह क्षमता दर्शाती है कि यह कवक मात्र मिट्टी में उगने वाला जीव नहीं है, बल्कि सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र में सक्रिय शिकारी की भूमिका भी निभाता है।
उपयोग और सांस्कृतिक इतिहास
ऑस्ट्रेलिया में यह प्रजाति इतनी सामान्य रूप से पाई जाती है कि 1981 में ऑस्ट्रेलिया पोस्ट द्वारा जारी एक डाक टिकट पर इसे दर्शाया गया था। यह इस कवक की सांस्कृतिक पहचान और लोकप्रियता का प्रमाण है।
यह मानव-उपयोग से जुड़ा एकमात्र दर्ज तथ्य है, जो दर्शाता है कि यह कवक अपने विशिष्ट रूप और व्यवहार के कारण जनसामान्य के ध्यान में रहा है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां यह सामान्यतः देखा जाता है।
रोचक तथ्य
- कई संस्कृतियों में इस कवक को वर्षा के बाद रातों-रात उगने वाली एक "जादुई" वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है, जिसने इसके इर्द-गिर्द रहस्यमय कथाओं को जन्म दिया।
- कहा जाता है कि इसके तरलीकृत (liquefied) रूप का उपयोग जॉर्ज वाशिंगटन के समय में स्याही के रूप में किया गया था।
संरक्षण स्थिति
- LC
- NT
- VU
- EN
- CR
संकटमुक्त
पारिस्थितिकी
व्यवहार
- परभक्षी
आवास
- घास का मैदान
- शहरी
- अशांत भूमि



