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Spiranthes spiralis

कोई दर्ज सामान्य नाम नहीं

Spiranthes spiralis के सफेद फूल तने के ऊपरी हिस्से में एक सर्पिल रेखा में व्यवस्थित होते हैं, मानो किसी पतली डोरी को तने के चारों ओर लपेट दिया गया हो। यह एक छोटा, धूसर-हरे रंग का ऑर्किड है जो यूरोप और उससे सटे उत्तरी अफ्रीका तथा एशिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है।

यह Orchidaceae कुल का सदस्य है और इसे CITES के परिशिष्ट II में सूचीबद्ध किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह फिलहाल विलुप्ति के खतरे में तो नहीं है, पर भविष्य में हो सकता है। बेल्जियम, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स में तथा फ्रांस के कुछ क्षेत्रों में इसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसकी धीमी वृद्धि, जटिल परागण प्रक्रिया और कवक पर निर्भरता इसे अध्ययन के लिए एक रोचक पौधा बनाती है।

पहचान और रूप

इस पौधे की सबसे पहचानने योग्य विशेषता इसके सफेद फूलों की सर्पिल व्यवस्था है, जो तने के ऊपरी आधे हिस्से में एक पंक्ति में कुंडली बनाते हुए खिलते हैं। तना धूसर-हरा, शाखारहित, सीधा और बेलनाकार होता है, जो सामान्यतः 7 से 20 सेंटीमीटर ऊँचा होता है, हालांकि दक्षिणी यूरोप में यह कभी-कभी 40 सेंटीमीटर तक भी पहुँच सकता है।

पुष्पक्रम 3 से 12 सेंटीमीटर लंबा होता है जिसमें सामान्यतः दस से पच्चीस छोटे, लगभग आधा सेंटीमीटर लंबे, सफेद फूल लगते हैं। निचली पंखुड़ी पर हल्का हरा धब्बा और एक जटिल, महीन दांतेदार किनारा होता है, जो फूल को कुल मिलाकर तुरही जैसा आकार देता है। फूलों से लिली ऑफ़ द वैली, वनीला या बादाम जैसी सुगंध आती है।

भूमिगत भाग में दो से चार, कभी-कभी छह तक, अंडाकार कठोर कंद होते हैं जो 1 से 3 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और जिनमें मिट्टी जैसी गंध आती है, जो उनकी माइकोराइज़ा के साथ संबंध से आती है। फूल आने के साथ या उसके बाद चार से पाँच पत्तियों का एक नया रोसेट बनता है, जो चमकीला नीला-हरा और अंडाकार होता है।

भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के पौधे पश्चिमी और मध्य यूरोप के पौधों की तुलना में अधिक सुदृढ़ और बड़े होते हैं। फूलों में कोई स्पर नहीं होता, जो अन्य कई ऑर्किड प्रजातियों से इसे अलग करता है, और यह अमृत भी उत्पन्न करता है, जो अधिकांश ऑर्किड में दुर्लभ विशेषता है।

वितरण और आवास

यह प्रजाति यूरोप में आयरलैंड से पुर्तगाल तक, दक्षिण में स्पेन, बेलिएरिक द्वीपों, अल्जीरिया के तटीय पहाड़ों, इटली, ग्रीस, तुर्की के भूमध्यसागरीय और काले सागर के तटों से लेकर काकेशस पर्वत, उत्तरी ईरान और पश्चिमी हिमालय तक फैली हुई है। उत्तर की ओर इसकी सीमा उत्तरी इंग्लैंड, नीदरलैंड्स, डेनमार्क और दक्षिणी बाल्टिक क्षेत्र से होते हुए पोलैंड और पश्चिमी यूक्रेन तक जाती है।

डेनमार्क में यह अब क्षेत्रीय रूप से विलुप्त मानी जाती है, हालांकि इसे स्वीडन के ओलैंड द्वीप पर सफलतापूर्वक पुनः स्थापित किया गया है। ब्रिटेन और आयरलैंड में इसकी उत्तरतम सीमा आइल ऑफ मैन है, और यह स्कॉटलैंड में कभी नहीं पाई गई। जर्मनी के कई क्षेत्रों जैसे सैक्सनी-एनहाल्ट, थुरिंजिया और निचले सैक्सनी में यह लगभग विलुप्ति के कगार पर है।

यह शुष्क घास के मैदानों, गारीग भूमि, हीथलैंड और चीड़ के जंगलों में उगता है, सामान्यतः चूना-युक्त मिट्टी पर। माना जाता है कि इसका मूल वितरण भूमध्यसागरीय था, और यह उत्तर की ओर तभी फैल पाया जब मनुष्यों ने जंगलों को खेती और पशुपालन के लिए साफ किया।

मासिक अवलोकन आंकड़ों में अगस्त और सितंबर के महीनों में स्पष्ट वृद्धि दिखाई देती है, जो संभवतः इसके देर गर्मी से शरद ऋतु के फूल आने के समय से मेल खाती है, हालांकि ये आंकड़े केवल उपस्थिति को दर्शाते हैं, जनसंख्या या पूर्ण वितरण को नहीं।

Spiranthes spiralis के दर्ज अवलोकनों का नक्शा
जहाँ इसे दर्ज किया गया है · GBIF
21,126
जन॰फ़र॰मार्चअप्रैलमईजूनजुल॰अग॰सित॰अक्टू॰नव॰दिस॰
मासिक घटना गणना · GBIF

वृद्धि और स्वरूप

यह एक बहुवर्षीय, कंदीय भूस्थित पौधा है जो गर्मियों में भूमिगत सुप्तावस्था में चला जाता है। अगस्त के अंत के आसपास पत्तियों का एक रोसेट निकलता है, जो सर्दियों भर हरा रहता है और जुलाई तक पूरी तरह मुरझा जाता है।

पौधे को इतना बड़ा होने में कि वह भूमि के ऊपर दिखाई दे, लगभग आठ वर्ष लगते हैं, और फूल देने वाला तना बनाने में तीन वर्ष और लगते हैं। इसके बाद भी यह अक्सर हर कुछ वर्षों में केवल एक बार ही फूलता है, क्योंकि बीज उत्पादन में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है। कठिन परिस्थितियों में पौधा बिल्कुल भी भूमि के ऊपर नहीं आता, जिससे लंबे अनुपस्थिति के बाद अचानक परिपक्व पौधे प्रकट होते दिखते हैं।

प्रजनन और जीवन चक्र

यह प्रजाति अगस्त से अक्टूबर के बीच, गर्मी के बाद फूलती है, और स्व-परागण नहीं करती। परागण मुख्यतः भौंरों और मधुमक्खियों द्वारा होता है, जिनमें नीदरलैंड्स में सामान्य कार्डर भौंरा और लाल-पूंछ भौंरा तथा दक्षिणी फ्रांस में मधुमक्खी शामिल हैं।

फूल प्रोटैन्ड्रस होते हैं, अर्थात पहले पराग छोड़ते हैं और बाद में परागण के लिए अनुकूलित होते हैं। परागणकर्ता तने के नीचे से ऊपर की ओर फूलों का दौरा करते हैं, और भौंरों की गिनती में उनकी मजबूत प्राथमिकता वामावर्त व्यवस्था वाले फूलों के लिए देखी गई है, जिसके अनुसार 52 प्रतिशत पौधों में फूल वामावर्त, 39 प्रतिशत में दक्षिणावर्त और 9 प्रतिशत में एकतरफा व्यवस्थित होते हैं।

प्रकृति में आधे से भी कम बीज कैप्सूल बीज उत्पन्न कर पाते हैं। अत्यंत सूक्ष्म बीज अक्टूबर या नवंबर में हवा द्वारा फैलते हैं, पर अधिकांश मातृ पौधे से कुछ डेसीमीटर से अधिक दूर नहीं जाते। पौधा सीमित रूप से भूमिगत तने पर नई कलियाँ बनाकर वानस्पतिक प्रजनन भी करता है, जिससे पौधे प्रायः छोटे घने समूहों में पाए जाते हैं।

पारिस्थितिकी और संबंध

यह प्रजाति विविध प्रकार की मिट्टियों पर उगती है—चाक और चूना पत्थर से लेकर रेत, बजरी और हल्की अम्लीय हीथलैंड तक—बशर्ते मिट्टी नाइट्रोजन और फॉस्फोरस में कम हो तथा न अधिक सूखी हो न अधिक नम। यह अक्सर भेड़ों या खरगोशों द्वारा गहन चराई से बने विविध घास के मैदानों में पाई जाती है, जहाँ छोटी, घनी और निरंतर घास होती है।

अधिकांश अन्य ऑर्किड की तरह, इसके बीजों में कोई पोषक भंडार नहीं होता, इसलिए अंकुरण के लिए इसे माइकोराइज़ा कवक की आवश्यकता होती है। परिपक्व पौधे भी अधिकांश वर्ष इस कवक को अपने भीतर रखते हैं, जिसकी मात्रा शरद और सर्दियों में अधिकतम होती है। यह पौधा Ceratobasidium और Rhizoctonia जैसी प्रजातियों के साथ-साथ कुछ ऐसे कवकों को भी आश्रय देता है जो अन्य पौधों में रोगजनक माने जाते हैं, जैसे Fusarium oxysporum, जिससे पता चलता है कि यह उन्हें नियंत्रण में रखने में सक्षम है।

इसके फूलों पर कई प्रकार के कीट आते हैं, जिनमें मधुमक्खियाँ और भौंरे प्रमुख हैं, जबकि इसकी पत्तियों और तनों को Uredo oncidii नामक रस्ट कवक संक्रमित कर सकता है। इसे कई पक्षी प्रजातियाँ भी खाती देखी गई हैं।

उपयोग और मानव संबंध

प्राचीन रोमन काल के वास्तुशिल्प में, जैसे अरा पासिस स्मारक की बाहरी फ्रीज़ और छतों की सजावट में, इस प्रजाति के फूलों जैसे पुष्प तत्वों की पहचान की गई है, जो दर्शाता है कि ऑर्किड की आकृतियाँ पश्चिमी कला में पहले की तुलना में कहीं अधिक प्राचीन काल से चित्रित होती रही हैं।

संरक्षण और खतरे

इस प्रजाति को CITES के परिशिष्ट II में रखा गया है, जो दर्शाता है कि यह अभी विलुप्ति के सीधे खतरे में नहीं है परंतु भविष्य में हो सकती है। इसके संरक्षण के लिए जलविज्ञान का सही संतुलन आवश्यक है—मिट्टी न अधिक सूखी हो न अधिक नम।

क्योंकि इस पौधे में प्रतिस्पर्धा की क्षमता कम है, मिट्टी में पोषक तत्वों की अधिकता, जैसे आसपास के खेतों से होने वाला यूट्रोफिकेशन, इसके लिए हानिकारक है। मिट्टी का अम्लीकरण भी एक चुनौती है, जिसे जलस्तर बढ़ाकर या अम्लीय ह्यूमस परत को हटाकर रोका जा सकता है। रेतीली मिट्टी पर छोटे पैमाने की भूसंरचना बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि सूखे और गीले दोनों वर्षों में उचित नमी बनी रहे।

फूल आने की अवधि में घास काटना या चराई करना नुकसानदेह है, जबकि इसके अतिरिक्त समय में भेड़ों या मवेशियों द्वारा चराई वनस्पति को छोटा रखने में सहायक होती है।

रोचक तथ्य

  1. रोमन काल के वास्तुशिल्प अलंकरणों में इस ऑर्किड जैसे पुष्प तत्व पाए गए हैं, जो इसकी सजावटी छवि को यूरोपीय कला के बहुत प्राचीन काल तक ले जाते हैं।
  2. स्पाइरैलिस शब्द मध्यकालीन लैटिन से आया है, जिसका अर्थ है एक निश्चित केंद्र के चारों ओर घूमना या कुंडली बनाना, जो इसके फूलों की व्यवस्था को सटीक रूप से दर्शाता है।

फ़ोटो

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पारिस्थितिकी और वर्गीकरण

वृद्धि का रूप

  • शाकीय पौधा

वर्गीकरण

संघ
Tracheophyta
वर्ग
Liliopsida
गण
Asparagales
कुल
Orchidaceae
वंश
Spiranthes
प्रजाति
Spiranthes spiralis

स्रोत

  1. GBIF Species names and classification
  2. iNaturalist Photos
  3. Wikidata Common names and conservation status
  4. Wikipedia Summary extract
  5. Plants of the World Online Native range, life form and climate (WCVP)
  6. GloBI What it eats, what eats it, parasites and pollinators
  7. trophiCH
  8. EuPPollNet